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Category: राजनीति

अभिनायक न्याय अधीक्षक ब्लैंचे ने कहा, ‘86 47’ संदेश पोस्ट करने वालों को कोमी जैसे नहीं दंडित किया जाएगा

संयुक्त राज्य संघीय न्याय विभाग के अभिकर्ता, लूसी ब्लैंचे, ने शुक्रवार को दी गई एक प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा कि "86 47" कोड वाले संदेशों को सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट किया जाता रहा है, पर उनका दायरा या सामग्री सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया। ब्लैंचे ने कहा कि फेडरल जांच में former FBI Director जेम्स कोमी के खिलाफ और साक्ष्य मौजूद हैं, पर उन्होंने उन साक्ष्यों का विवरण नहीं दिया।

यह बयान तब आया है जब कांग्रेस के कई सदस्य, विशेषकर रिपब्लिकन पक्ष, ने DOJ को कोमी के खिलाफ ठोस आरोप पेश करने के लिए दबाव डाला था, जबकि समान कोड वाली पोस्टों में लिप्त आम नागरिकों को कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं की गई। ब्लैंचे ने स्पष्ट किया कि उन लोगों को “अभियोग नहीं लगाया जाएगा” जैसा उन्होंने कहा, “जब तक हम उनके पास अन्य ठोस सबूत नहीं पाते”। यह बयान कई विपक्षी नेताओं ने “दुश्मनी का खेल” और “राजनीतिक साधनों से भरी जाँच” के रूप में निंदा किया।

वहीं, यह घटना भारत में लगातार चल रही न्यायिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही के सवालों को भी उजागर करती है। भारतीय संसद में भी अक्सर देखा गया है कि सरकार की प्रमुख नीतियों पर विरोध करने वाले नागरिकों को कठोर कानूनी प्रावधानों से टकराना पड़ता है, जबकि उसी अदालत में उच्च पदस्थ अधिकारियों को ‘विशिष्ट’ या ‘विशेष’ मामलों में भिन्न व्यवहार मिलता है।

रिपोर्टर द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों के अनुसार, DOJ ने कोमी के खिलाफ कई “इलेक्ट्रॉनिक संचार” की जांच जारी रखी है, पर साक्ष्य की प्रकृति गोपनीय रखी गई है। इसके विपरीत, “86 47” कोड वाली पोस्टों की पहचान के बावजूद उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, जिससे सार्वजनिक भरोसे में टिचकी लगने की आशंका है। विपक्ष का तर्क है कि यह असमानता लोकतंत्र के मूल सिद्धांत, समानता और न्याय के प्रति कटघरे पर सवाल खड़ी करती है।

विश्लेषकों का मानना है कि DOJ की इस रणनीति का उद्देश्य कोमी को एक “राजनीतिक दुश्मन” के रूप में अलग‑अलग सज़ा देना है, जबकि सामान्य नागरिकों को “ज्योतिषीय” संकेतों के रूप में टालना। इस संदर्भ में, कई राजनयिक और अधिकारिक विशेषज्ञों ने कहा है कि यदि साक्ष्य सार्वजनिक न हों, तो न्यायपालिका की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे।

आज के राजनीतिक माहौल में, इस प्रकार के असमान कानूनी प्राधिकरण का प्रयोग न केवल अमेरिकी लोकतंत्र की बहु-स्तरीय जाँच प्रणाली को चुनौती देता है, बल्कि भारत में भी समान रूप से लागू होने वाले ‘समान कानून, समान दंड’ के सिद्धांत को पुनः संशोधित करने की जरूरत पर प्रकाश डालता है। अंतिम निष्कर्ष अभी तक नहीं आया, पर यह मामला यह स्पष्ट करता है कि न्यायिक संस्थाएँ जब राजनीतिक दबाव में हों तो उनका निर्णय प्रक्रिया कितनी संवेदनशील हो सकती है।

Published: May 3, 2026