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Category: राजनीति

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अडेन गल्फ में समुद्री डाकूवाद की वापसी ने भारत की समुद्री सुरक्षा नीति को किया उजागर

गुड़गुड़ी करती हवाओं के बीच अडेन गल्फ के जल में तीन व्यापारिक जहाज़ों का हाइजैक किया गया, जिससे विश्व समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगा। इस घटना से न केवल अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग समुदाय बल्कि भारत के नीति निर्माताओं और विपक्षी दलों के बीच भी तीखी बहस छिड़ गई।

नौकाओं का कब्जा, जिसे अक्सर सोमालिया और यमन के क्षीण होते सरकारों के बीच अस्थिरता से जोड़ा जाता है, भारत के लिए एक रणनीतिक झटकिया साबित हो रहा है। बहुल समुद्री मार्गों, विशेष रूप से तेल और गैस के निर्यात‑आयाती कोरिडोर, का लगभग 70 % भाग इन जलमार्गों से होकर गुजरता है। इस कारण फोकस अब केवल अंतर्राष्ट्रीय नौवहन नहीं, बल्कि भारतीय आर्थिक हितों की सुरक्षा भी बन गया है।

भारतीय नौसेना ने तुरंत अपने मौजूदा ‘ऑपरेशन भद्रा’ के तहत तैनात पैंजरा बढ़ा दिया, जबकि रक्षा मंत्रालय ने कहा कि “समुद्री डाकूवाद के पुनरुत्थान को रोकने के लिए संयुक्त कार्यवाहियों में सक्रिय भागीदारी जारी रहेगी”। यह बयान, जो राष्ट्रीय सुरक्षा की घोषणा जैसा लग रहा है, विपक्षी दलों द्वारा ‘सिर्फ़ घोषणा‑ब्यां’ का आरोप लगाते हुए चुनौती दी जा रही है।

विपक्ष ने इस अवसर को सरकार की ‘समुद्री सुरक्षा में निरंतर गिरावट’ पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया। एक वरिष्ठ सांसद ने कहा, “जब तक भारत के नौसैनिक जहाज़ों को कारीगरों की तरह मरम्मत कराना पड़ता है, और नई ध्वज‑सेनाएँ बजट में कटौती के बाद ही बन पाती हैं, तब तक समुद्री डाकूवाद को रोकना एक हौले‑हौले सपना रहेगा।” उन्होंने अतिरिक्त बजट आवंटन और तटस्थ जल क्षेत्रों में एकीकृत निगरानी प्रणाली की माँग की।

सरकार की ओर से कहा गया “नवीनतम सैटेलाइट‑आधारित पर्सनल ट्रैकिंग प्रणाली” भी आलोचनात्मक लेंस के पास आया। कई विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि इस सिस्टम की डिप्लॉयमेंट गति और डेटा‑शेयरिंग प्रोटोकॉल अभी भी ‘भारी‑श्रम’ मोड में हैं, जो वास्तविक‑समय में दखल देने की क्षमता को सीमित करता है।

भौगोलिक‑राजनीतिक जटिलताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सोमालिया में अस्थिर सरकार और यमन में निरंतर संघर्ष, दोनों ही समुद्री डाकू समूहों को जोखिम‑भुगतान के बिना ‘ऑपरेटिंग लाइसेंस’ देते हैं। भारत की विदेश नीति, जो इस क्षेत्‍र में ‘दुर्लभ कूटनीतिक संतुलन’ की मांग करती है, अब बारीकी से जांच के दायरे में है।

सार्वजनिक हित के पहलू से देखी जाए तो बड़ी कंपनियों के बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी, निर्यात‑आयात लागत में वृद्धि और अंततः सामान की कीमतों पर असर स्पष्ट है। समुद्री डाकूवाद की पुनरावृत्ति से भारतीय उपभोक्ताओं तक भी इस अस्थिरता की धड़कन पहुँचती है, यही कारण है कि यह मुद्दा केवल विदेश नीति की बुनियादी जमीन तक सीमित नहीं रहकर आर्थिक नीति के उच्चस्तरीय चर्चाओं में भी प्रवेश कर गया है।

निष्कर्षतः, अडेन गल्फ में हुई ये घटनाएँ संक्षिप्त रूप से भारतीय समुद्री सुरक्षा रणनीति के अंतराल को उजागर करती हैं। जबकि सरकार ने त्वरित तैनाती का जप किया, विपक्ष ने लंबी अवधि की नीति‑निर्माण और तंत्र‑विकास की माँग की। इस परिदृश्य में ‘आवाज़‑संकल्प’ की ख़ुशबू नहीं, बल्कि ठोस और सतत् कार्रवाई ही एकमात्र समाधान बनकर उभरेगी।

Published: May 8, 2026