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Category: राजनीति

OPEC की टूट-फूट से ऊर्जा बाजार में अस्थिरता: भारत की नीतियों पर सवाल

अमेरिका‑ओरिएंटेड ऊर्जा नीति में बदलाव और OPEC के प्रमुख देशों के बीच मतभेद विश्व तेल‑बाजार को नई अस्थिरता से घेर रहे हैं। पिछले हफ्ते जारी किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि प्रमुख उत्पादकों के बीच उत्पादन लक्ष्य के बारे में असहमति ने कीमतों में दो‑अंकीय प्रतिशत की चढ़ाई करवा दी है। इस अनिश्चितता का सबसे बड़ा नुकसान भारत जैसी शुद्ध आयातक अर्थव्यवस्थाओं को उठाने वाला है।

भारत की मौद्रिक और राजकोषीय स्थिति पहले ही महंगाई‑संकट, बजट घाटा और जनसमुदाय में ईंधन सब्सिडी के विवादों से जूझ रही है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में बारेल की कीमतें 90‑100 डॉलर के स्तर पर पहुँचीं, तो भारत के आयात खर्च में अचानक 30‑35 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे राष्ट्रीय बजट में अतिरिक्त दबाव बना। केंद्र सरकार ने "ऊर्जा सुरक्षा" के वादे के साथ रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को 2025 तक दो से तीन गुना करने का लक्ष्य रखा था, पर वास्तविक कार्यान्वयन में देरी स्पष्ट रूप से दिख रही है।

विरोधी दल इस स्थितिको "सत्ता‑पक्ष के असफलता का सर्वोत्तम प्रमाण" कह कर उजागर कर रहे हैं। एंटी‑डिफ़ॉल्ट करेंसी-डेमिंग नीतियों को लेकर उन्होंने कहा कि सरकार का वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत‑विकास में निवेश अपर्याप्त है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा की लागत घटती जा रही है। विपक्षी नेता समुद्रनाथ सिंह ने खरीदा‑बिक्री के अंतर को 10 साल के भीतर पूरी तरह से ग्रीन ऊर्जा में बदलने की मांग रखी, यह कहते हुए कि "ब्याज‑भुगतान वाले राजकोषीय ऋण को तेल के आँसू में बदलना अस्वीकार्य है"।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने इस अस्थिरता को दूर करने के लिए दो‑मुख्य उपाय पेश किए: प्रथम, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के उतार‑चढ़ाव से बचाव हेतु फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स में बढ़ी हुई हेजिंग; द्वितीय, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और हाइड्रोजन‑आधारित बायो‑फ्यूल्स के उत्पादन को तेज़ करने के लिए "ऊर्जा संरक्षण योजना" की घोषणा। आलोचक इस कदम को "आकस्मिक" मानते हुए पूछते हैं कि क्या यह नीतियों को फिर से ब्लूप्रिंट करने के बजाय अल्पकालिक संकट सुलझाने की कोशिश नहीं है।

भविष्य में, यदि OPEC के भीतर की खींचतान जारी रही, तो तेल‑कीमतों में अधिक तीव्र उतार‑चढ़ाव की संभावना है। इससे भारत को न केवल परिचालन लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ेगा, बल्कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर भी भारी असर पड़ेगा, जो आगामी 2026 असेंबली चुनावों में मतदाता व्यवहार को गहराई से बदल सकता है। इस स्थिति ने नीति निर्माताओं को दो‑धारी चुनौती में डाल दिया है: एक ओर, अल्पकालिक वित्तीय स्थिरता को संभालना, और दूसरी ओर, दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण को वास्तविकता बनाना।

Published: May 6, 2026