EU‑UK व्यापार समझौते से यूके में कैंसर‑संबंधी ग्लीफ़ोसेट प्रयोग पर प्रतिबंध की संभावना
यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम के बीच नए व्यापार समझौते की पंक्तियों में ग्लीफ़ोसेट—एक ऐसा हर्बिसाइड जो लगभग सभी पौधों को मार देता है—पर प्रतिबंध का प्रावधान सामने आया है। यह प्रतिबंध केवल यूके के घरेलू आयात‑निर्यात नीतियों को नहीं, बल्कि वैश्विक खाद्य‑सुरक्षा चर्चा को भी नई दिशा देगा।
ग्लीफ़ोसेट को अनाज और दलहन फसलों पर कटाई से कुछ दिन पहले छिड़का जाता है, जिससे फसलें तेजी से सूख कर कटाई के लिए आसान हो जाती हैं। दक्षिण‑पूर्व एशिया में इस तकनीक को अक्सर ‘ड्राई‑ड्रॉप’ कहा जाता है, जबकि वैज्ञानिकों ने इसे कैंसर‑संबंधी जोखिम से जोड़ दिया है। यूरोपीय अधिकारियों के इस कदम को वह भी “जिम्मेदार बागवानी” का झंडा फहराते हुए पेश कर रहे हैं, जो कि भारत में भी वही दावों को लेकर चल रहे विवाद को परावर्तित करता है।
भारत में वर्तमान सरकार लगातार कृषि‑आधारित “आधुनिकता” के नाम पर कीटनाशकों के बड़े पैमाने पर उपयोग को बढ़ावा देती रही है। विरोधी दल, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिनिधि, इस नीति को “बजट कटौती के बाद का कच्चा उपाय” कहकर आलोचना करते आए हैं। यदि यूके को इस प्रतिबंध का सामना करना पड़े, तो यह प्रश्न उठता है कि भारत का उसी वर्ग का बड़ा‑बड़े फसलों में ग्लीफ़ोसेट प्रयोग किस हद तक जनता के स्वास्थ्य को जोखिम में डाल रहा है।
सत्ता पक्ष के राजनयिक समर्थकों ने कहा कि यूरोपीय दवाब को “आर्थिक सहयोग” के आड़ में दबाया जा रहा है, जबकि विपक्ष ने इस अवसर को “नीति‑विफलता का खुला लोहा” कहकर उजागर किया। वास्तव में, यूके‑EU समझौते की शर्तें भारतीय कृषि नीति को फिर से लिखने के लिए एक अप्रत्यक्ष प्रेरणा बन सकती हैं—जैसे ही भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करनी होगी, स्वास्थ्य‑सुरक्षा के मुद्दे को अनदेखा नहीं किया जा सकेगा।
दूरदर्शी दृष्टिकोण से देखा जाये तो इस विकास से भारतीय नियामक एजेंसियों को दो विकल्प मिलते हैं: या तो वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठाते हुए ग्लीफ़ोसेट के वैकल्पिक उपयोग को प्रोत्साहित करें, या फिर वही पुरानी “आर्थिक‑लाभ‑पहले” नीति को जारी रखें और संभावित स्वास्थ्य‑खर्च को अदृश्य मानें। जनता के हित में सवाल उठता है—क्या सरकार ने अपने “सुरक्षित खाद्य‑संकट” के वादे को प्रयोगशालाओं में ठोस डेटा के बिना ही दावों से भर दिया है?
भविष्य के लिए स्पष्ट है कि यदि यूके अपने ग्लीफ़ोसेट पर प्रतिबंध लागू करता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में “पारदर्शिता‑भरे” नियमों की माँग में नई ऊर्जा जुड़ जाएगी। भारतीय राजनीति में भी वही आवाज़ें उठेंगी, जो अब तक “बजट‑रोकथाम” के ब्रांड के पीछे छुपी थीं—अर्थात्, नीति‑निर्माताओं को अपने कृषि‑रोडमैप को पुनः संशोधित करने की आवश्यकता। इस परिलक्षित तथ्य में एक ही बात स्पष्ट है: विश्व‑स्तर पर स्वास्थ्य‑सुरक्षा को प्राथमिकता देना ही वह वास्तविक ‘राजनीतिक शक्ति’ है, जिसे चुनावी दावों के पर्चे में नहीं, बल्कि निरंतर उत्तरदायी प्रशासन में परखा जा सकता है।
Published: May 6, 2026