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BP ने इंग्लैंड के कार्बन कैप्चर प्रोजेक्ट से भागीदारी घटाने की योजना, भारत में हरे एजेंडे पर सवालों की लहर
वास्तव में, ब्रिटिश तेल दिग्गज BP ने उत्तर‑पूर्व इंग्लैंड में दो प्रमुख कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) परियोजनाओं में अपनी हिस्सेदारी घटाने का इरादा जताया है। यह कदम कंपनी के ‘हरे एजेंडे’ से धीरे‑धीरे पीछे हटने का स्पष्ट संकेत है, जबकि परियोजनाओं को शेयरधारकों का भरोसा नहीं मिल पा रहा था। प्रमुख परियोजना, नेट ज़ीरो टीसाइड (NZT), यूके की पहली गैस पावर प्लांट को अत्याधुनिक कार्बन पकड़ तकनीक से लैस करने की कल्पना किये गये थी, परन्तु निवेशकों की अनिच्छा ने इस पर बड़ी छाया डाली।
भारत में इस समाचार ने कई राजनीतिक धागे ख़ींचे हैं। केंद्रीय सरकार ने हाल ही में अपने 2030 तक नेट‑ज़ीरो लक्ष्य को सुदृढ़ करने की घोषणा की थी, जबकि विदेशी फर्मों की ऐसी वापसी से यह संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर ग्रीन फाइनेंस अभी भी अस्थिर है। विपक्षी दल, विशेष रूप से राष्ट्रीय लोकतंत्र मंच, ने इस पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि भारत को विदेशी कंपनियों के असफल प्रयासों पर अपने ही जलवायु लक्ष्यों को अलग‑अलग आश्रित नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा, “यदि BP जैसी कंपनी अपना निवेश घटा रही है, तो क्या भारत अपने जलवायु‑संकल्प को वास्तविकता में बदलने के लिए घरेलू संसाधनों को तेज़ी से जुटाएगा?”
सरकारी पक्ष ने प्रतिक्रिया में कहा कि विदेशी तकनीकी सहयोग की कमी को दूर करने के लिये भारत ने हाल ही में कार्बन कैप्चर की राष्ट्रीय नीति को मजबूत किया है, जिसमें निजी और सार्वजनिक दोनों निवेशकों के लिए रियल-टाइम सब्सिडी और कर राहत प्रदान की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही BP पीछे हटे, लेकिन इस क्षेत्र में कई घरेलू कंपनियां और स्टार्ट‑अप्स नई तकनीक विकसित कर रहे हैं, जो न केवल ऊर्जा सुरक्षा बल्कि रोजगार सृजन में भी मददगार होंगे।
वहीं, पर्यावरण अनुसंधान केंद्रों के विशेषज्ञों ने इस घटना को ‘नीति‑और‑बाजार का असंगत मिश्रण’ बताया। उन्होंने उजागर किया कि कार्बन कैप्चर तकनीक अभी व्यावसायिक रूप से स्थिर नहीं है और इसके वित्तीय मॉडल में अनिश्चितता बनी हुई है। इस प्रकार की असफलताओं को देखते हुए भारत को एक ही बात पर दोहराना चाहिए – ग्रीन प्रौद्योगिकियों में विदेशी निर्भरता कम करना और घरेलू नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिये स्पष्ट, निरंतर और दीर्घकालिक नीति ढांचा तैयार करना।
जनजागृति के स्तर पर इस खबर ने सामाजिक मीडिया पर भी हलचल मचा दी है। कई पर्यावरण कार्यकर्ता अब सरकार से पूछ रहे हैं कि ‘वैश्विक स्तर पर जब बड़े तेल कंपनियां अपने हरे वादे पीछे छोड़ रहे हैं, तो भारत को किस दिशा में अपनी ऊर्जा नीति चलानी चाहिए?’ कुछ ने तो इस बात को ‘हरे एजेंडे के पैरेडॉक्स’ कहा, जहाँ औद्योगिक विकास की घोषणा के साथ ही बाहरी निवेश के अनुपलब्धता से लक्ष्य अधूरा रह जाता है।
सारांश में, BP की हिस्सेदारी घटाने की योजना केवल एक व्यावसायिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत में जलवायु नीति के प्रयोगात्मक चरण की कठोर परीक्षा है। यह परीक्षण इस बात का संकेत देगा कि सरकारी दावे, विपक्षी आलोचना, और वास्तविक तकनीकी एवं वित्तीय बाधाओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है – या फिर फिर से ‘हरे शब्दों’ के पीछे धुंधली आशाएँ ही रह जाएँ।
Published: May 7, 2026