विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
ASEAN शिखर सम्मेलन में ईरान‑इज़राइल युद्ध के बाद हार्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की मांग, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा दबाव
जुड़वाँ द्वीपसमूह में आयोजित इस वर्ष का ASEAN शिखर सम्मेलन, मलेशिया के कुआला लंपुर में, एक अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय मुद्दे के इर्द‑गिर्द घूमा है—ईरान‑इज़राइल युद्ध के कारण हार्मुज़ जलडमरूमध्य का बंद होना। इस रणनीतिक सागर निकाय को फिर से खोलने की अपील, शिखर के एजेंडे में विशेष स्थान रखती है, क्योंकि वही जलडमरूमध्य विश्व तेल व्यापार का लगभग पाँच प्रतिशत हिस्सा संभालता है।
भारत, जो अपने 70 % से अधिक तेल आयात हार्मुज़ के माध्यम से करता है, इस संदर्भ में अपनी रणनीतिक घोर चिंता स्पष्ट कर रहा है। विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर कहा कि “दुर्लभ ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को गहरा किया जाना चाहिए, और यह जलडमरूमध्य के पुनः खोलने में प्रमुख भूमिका निभाएगा।” सरकार के इस बयान में, विदेश मंत्रालय की कूटनीतिक अपेक्षाओं और रक्षा मंत्रालय की सुरक्षा चुनौतियों के बीच का अंतराल स्पष्ट दिखता है।
विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस और प्रमुख राज्य स्तरीय नेता, इस अवसर का उपयोग मौजूदा ऊर्जा नीति की आलोचना करने के लिए कर रहे हैं। वह मानते हैं कि भारत ने वर्षों से ऊर्जा आयात में विविधता लाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए, और आज का संकट सरकार की लापरवाही का परिणाम है। “जब तक देश के पास पर्याप्त घरेलू विकल्प नहीं होते, तब तक एक जलडमरूमध्य पर निर्भर रहना असुरक्षित है,” एक सांसद ने सत्र में टिप्पणी की। यह बयान, सरकार के “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” के प्राचीन घोषणापत्र के साथ टकराव में है।
शिखर में दो प्रमुख प्रस्ताव पेश किए गए: पहला, एशिया‑पैसिफिक देशों के बीच पेट्रोलियम उत्पादन, शोधन और परिवहन के लिए एक “ऊर्जा सुरक्षा कोऑर्डिनेशन मंच” स्थापित करना; दूसरा, हार्मुज़ को पुनः खोलने हेतु अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा बल का गठन, जिसमें भारत, जपान, ऑस्ट्रेलिया और यूएसए की भागीदारी envisaged है। इन्होंने कुछ देशों से त्वरित समर्थन पाया, परंतु वास्तविक कार्यान्वयन में कई बाधाएँ बरकरार हैं—जैसे ईरान‑इज़राइल तनाव का प्रचलित रहना और यूएस-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रभाव।
भारी जलडमरूमध्य बंद होने से तेल की कीमतें पहले ही 8 % तक बढ़ चली हैं, जिससे भारतीय उपभोक्ता और छोटे उद्योगों की जेब पर सीधे असर पड़ा है। इस पर, वित्त मंत्रालय ने “वित्तीय राहत” पैकेज का वादा किया, परंतु विरोधी दल इसे “अस्थिरता के बीच तुच्छ उपाय” कह कर प्रश्नवाचक बना रहे हैं। विशेष रूप से, द्रव्यमान ऊर्जा करों और संशोधित मूल्य नियंत्रणों की मांग को सरकार ने सामने नहीं लाया, जिससे सार्वजनिक भरोसा और भी क्षीण हो रहा है।
इस विकास की दोहरी दुष्प्रभावीता स्पष्ट है: एक ओर, भारत को क्षेत्रीय कूटनीति में अधिक सक्रिय होना पड़ेगा, जबकि दूसरी ओर, घरेलू ऊर्जा नीति को मौलिक रूप से पुनःडिज़ाइन करना आवश्यक है। यह शिखर, अगर सही दिशा में प्रयोग हो, तो भारत को बहु-राष्ट्रीय ऊर्जा मंच पर एक प्रमुख आवाज़ बना सकता है। लेकिन यदि कूटनीतिक शब्दावली और वास्तविक कार्यवाही में अंतर बना रहता है, तो सरकार को “ऊर्जा सुरक्षा” के बहानों में ही फँसे रहने का जोखिम है।
अंततः, ASEAN शिखर की प्रस्तुतियों का भार केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर नहीं, बल्कि भारतीय जनता की ऊर्जा प्राप्ति के अधिकार पर भी है। यह सवाल तब तक बना रहेगा, जब तक शासन‑विपक्ष की बहस में स्पष्ट नीति‑निर्धारण और वास्तविक जवाबदेही नहीं दिखती।
Published: May 8, 2026