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हर्मुज जाम से 40 से अधिक भारत‑उन्मुख जहाज फंसे, सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल
स्ट्रेट ऑफ़ हर्मुज के जलमार्ग में आजकल लगातार बढ़ती तनावपूर्ण स्थिति ने 40 से अधिक ऐसे जहाज़ों को रोक दिया है जो भारत की तेल, LNG और कंटेनर आयात को संभाल रहे थे। तुर्की, इज़राइल‑फिलिस्तीन झड़प के बाद इस क़ीमती जलमार्ग में नई नौसैनिक रोक लगा, जिससे जहाज़ों को ओमान या रेड सी द्वारा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ा।
भारी तेल क्रीफ्टर, मिड‑इस्ट में बंधे एलएनजी टैंकर और कई कंटेनर बेकर, सभी को अब या तो ऑरलैंड के आसपास लंगर डाला गया है या फिर मोरक्को के बंदरगाहों पर अटक कर इंतजार करना पड़ रहा है। देर तक बीता समय‑सीमा, बढ़ती फ्यूल लागत और अनिश्चित लैंडिंग‑समय ने भारतीय रिफ़ाइनरियों में रिफ़्लॉक्स पैदा कर दिया है।
संबंधित पक्षों में सबसे पहले भारतीय निर्यात‑आयात निगम (कॉमिंटेक), भारतीय नौसेना, तथा विदेश मंत्रालय का उल्लेख होना चाहिए। उन्होंने संयुक्त रूप से बताया कि समुद्री सुरक्षा परिषद (IMO) और संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से मामले का समाधान निकाला जा रहा है, परन्तु अब तक कोई ठोस कदम नहीं दिखा। विदेश मंत्रालय ने कई देशों के राजनयिक प्रतिनिधियों को घेराबंती की सूचना देने के साथ‑साथ तेल कंपनियों को वैकल्पिक मार्गों की योजना बनाने का आदेश दिया। भारतीय नौसेना ने कहा कि अपने जहाज़ों को सुरक्षित करने के लिये ‘हर्मुज ऑपरेशन’ की तैयारी में है, परन्तु अतिरिक्त सशस्त्र गश्ती में देरी से प्रश्नचिह्न जुड़ते हैं।
सरकारी प्रतिक्रिया में स्पष्ट नीति‑अंतराल दिख रहा है। जबकि प्रमुख मंत्री मंडल में ऊर्जा सुरक्षा को शीर्ष प्राथमिकता दी गई थी, हर्मुज की अस्थायी बंदी से निपटने के लिये कोई सशक्त आपात‑प्रबंधन योजना नहीं थी। कई विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की गहन जलमार्ग‑निर्यात निर्भरता का मूल्यांकन न करने का दावा अब बकवास बनकर सामने आया है।
प्रभाव की बात करें तो इस जाम ने भारत के तेल आयात में 5‑6 % की गिरावट और निर्यात‑आयात लागत में 12‑14 % की उछाल पैदा कर दी है। समुद्री माल运क को उच्च बैंकर चार्ज देनें पड़ रहे हैं, जिससे वस्तु मूल्य में धक्का लग रहा है। छोटे व्यापारियों को अब वैकल्पिक मार्गों की लागत का वहन करना पड़ेगा, जबकि बड़े क्रूड कंपनियों को स्टॉक्स को डिटेनर में रखकर आर्थिक दबाव सहना पड़ेगा।
नीति‑निर्माताओं को अब दो बिंदु स्पष्ट रूप से समझाने चाहिए: प्रथम, हर्मुज जैसी कष्टदायक जलमार्ग की अस्थिरता को देखते हुए वैकल्पिक समुद्री‑स्थलीय मार्गों (जैसे भारत‑आधारित यूएई‑ओमान‑सरोवर‑रॉड) की तत्काल योजना बनानी होगी। द्वितीय, समुद्री सुरक्षा में संस्थागत सुस्ती को दूर करने के लिये एक स्वतंत्र ‘समुद्री आपातकाल प्रबंधन एजेंसी’ का गठन आवश्यक है, जिसका कार्य प्राथमिकता, त्वरित निर्णय और अंतरराष्ट्रीय समन्वय को सुनिश्चित करे।
अंततः, हर्मुज जाम ने भारतीय प्रशासनिक तंत्र की अस्थिरता को उजागर किया है। यह समय है जब नीति‑निर्माताओं को न केवल तत्काल बाधाओं को दूर करना चाहिए, बल्कि भविष्य में ऐसी जलमार्ग‑विरोधी घटनाओं के लिये संरचनात्मक तैयारियों में निवेश करना चाहिए, ताकि भारत की ऊर्जा और व्यापार सुरक्षा में कोई चूक न रहे।
Published: May 8, 2026