हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस पर रिनिकी‑ज़ुबीन को राजनैतिक सहयोग के लिए धन देने का आरोप लगाया
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 6 मई, 2026 को सार्वजनिक मंच पर यह दावा किया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उनके परिवार के दो प्रमुख व्यक्तियों – उनकी पत्नी रिनिकी भुयन (जिनका व्यापारिक पृष्ठभूमि उल्लेखनीय है) तथा लोकप्रिय गायक‑राजनेता ज़ुबीन गर्ग – को राजनीति में सक्रिय करने के लिये ‘पैसे’ प्रदान किए हैं। यह बयान असम में आगामी विधानसभा चुनावों की दहलीज़ पर आया, जहाँ दोनों पक्षों के बीच ध्रुवीकरण पहले से ही तीव्र है।
सरमा के इस बयान के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: पहला, कांग्रेस ने आर्थिक रूप से रिनिकी भुयन को समर्थन देकर उनके व्यावसायिक संस्थाओं को असम‑बिहार‑ओडिशा के व्यापारिक नेटवर्क में आगे लाने का प्रयास किया, दूसरा, ज़ुबीन गर्ग को लुभाने हेतु उन्हें फ़िल्म‑संगीत उद्योग से जुड़े विकल्पों के अलावा राजनीतिक मंच भी प्रदान किया गया। सरमा ने इन दावों को ‘साक्ष्य‑सहित’ कहा, परन्तु कोई दस्तावेज़ी प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया गया।
विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस, ने इस आरोप को “बिना आधार के राजनीतिक शब्दजाल” घोषित किया और तुरंत ही यह मांग की कि असम के राज्य प्रशासन इस विवाद की गंभीर जाँच करे। हालांकि, असम की एस्पीसी (केंद्रीय पुलिस) ने अभी तक किसी आधिकारिक दायरे में जांच शुरू करने की सूचना नहीं दी है।
यह घटना भारत के राजनैतिक वित्तीकरण की मौजूदा रफ़्तार को उजागर करती है, जहाँ चुनावी खर्चों की पारदर्शिता और धन के स्रोतों की जाँच में संस्थागत असफलता साफ़ दिखती है। चुनाव आयोग, जो मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट की निगरानी के लिये गठित है, अब तक इस आरोप पर कोई टिप्पणी नहीं कर पाया है। इस प्रकार, नियामक निकायों की जवाबदेही और कार्य‑सक्षम्यता पर सवाल खड़े होते हैं।
नीति‑निर्माताओं द्वारा प्रस्तावित ‘राजनीतिक दान की सीमा’ और ‘सार्वजनिक हित के लिए वित्तीय खुलासे’ के नियमों को लागू करने में निरंतर ढिलाई के कारण, व्यक्तिगत और सामुदायिक हितों के बीच रेखा धुंधली होती जा रही है। यदि इस तरह के आरोपों को ठोस जांच और उचित कार्रवाई के बिना सार्वजनिक बहस में ही बदल दिया जाए, तो लोकतांत्रिक संस्थानों में सार्वजनिक विश्वास घटेगा और चुनावी प्रक्रिया के मौलिक सिद्धांतों को क्षति पहुँचेगी।
वर्तमान में, इस विवाद का प्रमुख प्रभाव असम के राजनैतिक माहौल में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी वित्तीय पारदर्शिता और चुनावी एथिक्स पर चर्चा को आग सकता है। यह स्पष्ट है कि यदि सरकार व विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे को ‘राजनीति की लकीर’ के रूप में टालते रहेंगे, तो ‘धन की राजनैतिक शक्ति’ मौलिक रूप से निरंकुश रह सकती है। अंततः, इस मामले में प्रशासनिक तत्परता, संस्थागत जवाबदेही और नीति‑कार्यान्वयन की कमी ही सबसे बड़ी कमी रह जाएगी।
Published: May 6, 2026