हिमंताबिस्वा सार्मा का ‘मिया’ लेबल कांग्रेस पर, मतदाताओं की सोच में बदलाव
असम के मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय लोक गठबंधन (बीजेपी) के प्रमुख हिमंताबिस्वा सार्मा ने हाल ही में विरोधी कांग्रेस को ‘मिया’ शब्द में बधित किया, जिससे राजनीतिक माहौल में तीखा परंतु नाकाबिले‑ग़ैर‑परिचालन‑कुतूहली विषाक्तता पैदा हुई। इस शब्द-उपयोग ने न केवल वैध वैर को दर्शाया, बल्कि तत्कालीन वोटर बेस में सामाजिक‑धार्मिक विभाजन को भी तेज़ कर दिया।
दिसंबर 2025 के राज्यीय चुनाव में, कांग्रेस ने अपनी नीति‑प्रस्तावना को विकास‑केंद्रित, जल‑प्रबंधन और अस्मिता‑आधारित विभाजन मुक्त रखकर प्रस्तुत किया था। परन्तु सार्मा के ‘मिया’ लेबल ने इस संदेश को धुंधला कर दिया। कई मतदाता, विशेषकर ग्रामीण एवं दलित‑अधिवासी क्षेत्रों में, अब कॉंग्रेस को मुख्यधारा की मुसलमान‑जनसंख्या के साथ गठबंधन का प्रतीक मानने लगे।
ऐसे माहौल में असम की चुनावी प्रबंधन व्यवस्था पर भी प्रश्न उठे। राज्य निर्वाचन कार्यालय ने इस विभाजन‑संकल्प शब्द को लेकर कोई स्पष्ट आशय नहीं दिया, जबकि चुनाव आयोग को इस प्रकार के सामाजिक‑धर्मीय व्याख्यान को रोकने की जिम्मेदारी होती है। प्रशासनिक चुप्पी को संस्थागत सुस्ती की एक स्पष्ट मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया गया।
वहीं, असम सरकार की नीतिगत विफलताएँ भी इस राजनीतिक जलवायु को पोषित कर रही थीं। पिछले दो वर्षों में क्षेत्रीय बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं में देरी, बेरोज़गारी के आंकड़ों में निरंतर वृद्धि, तथा स्वास्थ्य संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव—इन सबने न तो उत्तरदायी शासन का चित्र पेश किया और न ही जनता के भरोसे को सुदृढ़ किया। ऐसी असक्षमता के परिप्रेक्ष्य में, विरोधी दल को ‘मिया’ के अल्पविरोधी शब्द से चिह्नित करना, सत्ता में बने रहने के लिये एक अस्थायी लाभ जैसा दिखा।
नीति‑निर्माताओं को अब समझना होगा कि सामाजिक‑धर्मीय लेबलिंग से प्राप्त अस्थायी वोट‑बैंक, शून्य‑स्थायित्व वाले प्रबंधन की चुनौतियों को नहीं सुलझा पाता। एक प्रभावी लोकतंत्र के लिये उत्तरदायी शासन, समय पर सार्वजनिक सेवाओं का वितरण तथा संस्थागत जवाबदेही अनिवार्य हैं। यदि प्रशासनिक लापरवाही को शब्दात्मक राजनीति से ढक दिया गया, तो भविष्य में सार्वजनिक भरोसा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिरता दोनों ही अतिक्रमित हो सकते हैं।
Published: May 5, 2026