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Category: भारत

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हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा का इस्तीफा स्वीकार नहीं, पद पर बने रहना प्रशासनिक चूक दर्शाता है

देर रात में प्रस्तुत किया गया इस्तीफे‑पत्र अभी भी औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है, और न्यायाधीश यशवंत वर्मा हाई कोर्ट की बेंच पर मामलों की सुनवाई जारी रख रहे हैं। इस असामान्य परिप्रेक्ष्य ने न केवल न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रशासनिक ढाँचे में मौजूद अंतराल को भी उजागर किया है।

इस्तिफा कब दिया गया, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है, परन्तु कई स्रोतों ने बताया कि यह कई हफ्ते पहले ही प्रस्तुत किया गया था। भारत के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश का इस्तीफा स्वीकार करने की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से निर्धारित है: न्यायालय के चेयरमैन, राज्य के गवर्नर (या विधायी परिषद), तथा अक्सर सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को सम्मिलित करना आवश्यक होता है। इस मामले में, न तो सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया मिली, न ही राज्य के गवर्नर ने इस्तीफे को मंजूरी दी। परिणामस्वरूप, न्यायाधीश अपने मौजूदा पद पर ही कार्यरत बने रहे।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया का अभाव इस बात को संकेत देता है कि न्यायिक पुनर्संरचना और मानव संसाधन प्रबंधन में स्पष्ट प्रोटोकॉल के अभाव में संस्थागत लापरवाही घटित हो रही है। जब एक उच्च पदस्थ न्यायाधीश खुद को हटाने का इरादा स्पष्ट कर देता है, तो प्रत्याशित है कि एक टाइम‑लाइन और संचार व्यवस्था स्थापित हो – वह न हो तो लगातार अनिश्चितता बनती है।

इस विफलता के कई नतीजे सामने आए हैं। प्रथम, मौजूदा मामलों में पक्षकारों को यह नहीं पता चल पाता कि उनका न्यायाधीश निकट भविष्य में उपलब्ध रहेगा या नहीं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में देरी और अनुचित न्यायसंगतता उत्पन्न होती है। द्वितीय, ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायपालिका के भीतर ‘अधिकारीवर्गीय जड़ता’ ने काम को ठप्प कर रखा है—इस्तिफा को स्वीकार करने का एक साधारण कदम प्रशासनिक कष्ट का बन गया है। तृतीय, सार्वजनिक विश्वास धीरे‑धीरे क्षीण हो रहा है; नागरिकों के लिए यह भ्रम पैदा करता है कि न्यायपालिका, जो कानून के अभ्यंतरिक स्तम्भ के रूप में स्थित है, वह स्वयं के आंतरिक अनुशासन में भी असफल हो सकती है।

नीति‑निर्माताओं को इस अवसर को दोहराव को रोकने के लिए एक स्पष्ट, चरणबद्ध कार्यप्रणाली अपनाने का आह्वान करना चाहिए। सुझावों में शामिल है: (i) इस्तिफा‑पत्र के प्राप्ति के साथ ही स्वचालित रूप से एक ‘प्रोविज़नल इंटिमेट’ जारी करना, (ii) निष्ठा एवं उत्तरदायित्व के लिए अनिवार्य समय‑सीमा (जैसे 15‑दिन) निर्धारित करना, तथा (iii) इस प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करना ताकि सभी हितधारक स्थिति से अवगत रह सकें।

जब तक ऐसी संरचनात्मक सुधार नहीं किए जाते, तब तक विद्यमान ‘संकट‑मुक्त’ न्यायिक प्रणाली का दावों पर भरोसा केवल शब्दावली में ही सीमित रह सकता है। न्यायाधीश यशवंत वर्मा की इस अनपेक्षित स्थिति ने प्रशासनिक कमियों की बारीकी से झलक प्रस्तुत कर दी है, और यह प्रश्न उठाता है कि क्या न्यायपालिका, जो स्वयं को जवाबदेह बनाती है, अपने भीतर स्वयं को जवाबदेह बनाने में सक्षम है।

Published: May 7, 2026