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Category: भारत

सरकार ने सभी बच्चों में मधु रोग की स्क्रीनिंग और जीवन‑भर मुफ्त इलाज RBSK के तहत शुरू किया

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 4 मई 2026 को एक विस्तृत दिशा‑निर्देश जारी किया, जिसमें राष्‍ट्रीय बाल स्वास्‍थ्य कार्यक्रम (RBSK) के दायरे को विस्तारित कर सभी 0‑18 वर्ष के बाल‑बालिकाओं में मधु रोग की अनिवार्य स्क्रीनिंग और उसके बाद जीवन‑भर मुफ्त उपचार का प्रावधान किया गया। यह कदम उन बढ़ती मान‑कियों के प्रत्युत्तर में है, जो पिछले पाँच वर्षों में भारत में बाल‑मधु रोग की घटनाओं में निरन्तर वृद्धि दर्शाती हैं।

परियोजना के अनुसार, प्रत्येक सरकारी स्कूल के स्वास्थ्य कक्ष में रक्त‑शर्करा परीक्षण की व्यवस्था की जाएगी, डेटा डिजिटल हेल्थ आईडी में संजोया जाएगा और सकारात्मक परिणामों वाले बच्चों को निकटवर्ती प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में मुफ्त इंसुलिन, ग्लूकोज़ मॉनिटर और पोषण परामर्श प्रदान किया जाएगा। केंद्रीय योजना के तहत 3 साल में 12 करोड़ बच्चों की स्क्रीनिंग करने तथा 1.5 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित करने का लक्ष्य रखा गया है।

नियमित कार्यवाही के लिए राज्य स्वास्थ्य विभागों को मासिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने और राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वेक्षण बोर्ड स्थापित करने का निर्देश दिया गया है। प्रतीत होता है कि पिछले RBSK कार्यान्वयन में ‘डिज़ाइन‑से‑इम्प्लीमेंट’ गैप को पाटने के लिये डिजिटल तालमेल को अनिवार्य किया गया है, परंतु इस तरह के बड़े‑पैमाने पर डेटा‑भंडारण एवं विश्लेषण के लिये पर्याप्त आईटी क्षमता की कमी अब भी चिंता का विषय है।

जबकि सरकार ने इस पहल को “जीवन‑भर का मुफ्त इलाज” कहा है, तो पिछले वर्षों में कई समान योजनाएँ – जैसे राष्ट्रीय प्री‑स्कूल कैंसर नियंत्रण योजना (NPCDCS) और आयुष्मान भारत – के तहत फंड्‍स का समय पर जारी न होना, दर्जा‑रहित कर्मियों की कमी और निगरानी प्रणाली की अपर्याप्तता ने लाभ‑ग्राहकों को अक्सर “कागजों पर ही” रहने का कारण बनाया। आलोचक इशारा करते हैं कि इसी ढिलाई को दोहराने का जोखिम इस नई योजना में भी मौजूद है।

नीति‑निर्माताओं का तर्क है कि स्कूल‑आधारित स्क्रीनिंग से लीगल रूप से “जमीनी स्तर की पहुँच” सुनिश्चित होगी, परन्तु यह प्रश्न अभी बना रहता है कि ग्रामीण एवं शहरी प्रवासी बच्चों को किस‑हद तक इस नेटवर्क में जोड़ा जाएगा। इसके अतिरिक्त, मौजूदा स्वास्थ्य‑सेवा कर्मियों को अतिरिक्त प्रशिक्षण व इंसुलिन भंडारण सुविधाओं की आवश्यकता होगी – एक ऐसा बिंदु जो कई राज्य स्वास्थ्य निकायों ने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है।

इस कार्यक्रम की सफलता का आकलन तभी संभव है जब बजट के प्रयोग की पारदर्शिता, वास्तविक समय में डेटा‑विचार और अनुगमन के लिए स्वतंत्र प्राधिकरण स्थापित किया जाए। वर्तमान में जहाँ कई सरकारी पहलों में “घोषणा‑से‑कार्यान्वयन” तक का अंतराल न्यूनतम दिखाया जाता है, वहीं इस प्रस्तावित स्क्रिनिंग को भी उसी सिलसिले में फँसने से बचाना आवश्यक है।

यदि प्रशासनिक अभिरुचि के साथ सक्रियता, निरंतर फंड‑प्रवाह और स्थानीय डॉक्टरों की भागीदारी सुनिश्चित हो, तो यह पहल भारत में बाल‑मधु रोग की रोकथाम व समय पर उपचार में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन सकती है। अन्यथा, यह एक बार फिर “पत्रिकाओं पर लिखा” नीति‑बिल बनकर इतिहास में दर्ज होगी, जिससे नागरिकों का विश्वास और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की विश्वसनीयता दोनों ही क्षीण हो सकते हैं।

Published: May 4, 2026