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सरकारी आदेश ने अस्पतालों के आग सुरक्षा मानकों को कड़ा किया, अनिवार्य ऑडिट और निकाली योजना पेश

भारत सरकार ने 5 मई 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी नई राष्ट्रीय दिशा‑निर्देशों के माध्यम से अस्पतालों में आग सुरक्षा को कड़े चरणों में परिवर्तित कर दिया है। इन नियमों के तहत सभी स्वास्थ्य संस्थानों, विशेषकर तीव्र देखभाल इकाइयों (ICU) में, उच्च ऑक्सीजन उपयोग और जटिल विद्युत नेटवर्क से जुड़ी संभावित जोखिमों को कम करने हेतु नियमित निरीक्षण, स्वतंत्र ऑडिट और स्पष्ट निकासी योजना अनिवार्य की गई है।

परिचालनिक रूप से नई पहल का मुख्य बिंदु दोस्तरीय है: प्रथम, प्रत्येक अस्पताल को वार्षिक अग्नि सुरक्षा ऑडिट करवाना होगा, जिस पर राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त संस्था को प्रमाणपत्र जारी करना अनिवार्य है। द्वितीय, घटित होने पर संरक्षित रोगियों के त्वरित और सुरक्षित निकास के लिए विस्तृत मानचित्र, संकेतक एवं प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता को लिखित रूप में प्रमाणित करना होगा। इन नियामक उपायों का लक्ष्य पिछली कुछ वर्षों में हुए घटित अस्पताल आग दुर्घटनाओं के आँकड़े को रोकना और मरीज‑केंद्रित सुरक्षा संस्कृति की स्थापना है।

हालाँकि, नीति का उल्लेखनीय पहलू यह है कि यह पिछले नियामकों की चूकों को सीधे संबोधित करता है—जैसे कि ऑक्सीजन‑संचालित रोगियों की निकटता में जल स्रोतों की अनियंत्रित होना, तथा अद्यतन नहीं की गई विद्युत प्रणाली। इस संदर्भ में नई दिशा‑निर्देशें “वातावरण‑सुरक्षा” की अवधारणा को “रोगी‑सुरक्षा” के साथ जोड़ती हैं, जिससे उत्तरदायित्व स्पष्ट हो जाता है।

पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी अब केंद्र के साथ-साथ राज्य स्वास्थ्य विभागों पर सौंप दी गई है। मुख्यालय ने बताया कि प्रत्येक राज्य को “उपयुक्त निगरानी तंत्र” बनाकर अस्पतालों को त्रैमासिक रिपोर्ट जमा करने की व्यवस्था करनी होगी। इसके अतिरिक्त, अनुपालन न करने वाले संस्थानों पर आर्थिक दंड व लाइसेंस रद्दीकरण की संभावना रखी गई है।

नीति निर्माताओं का दावा है कि ये उपाय “संस्थागत सुस्ती” को मात देंगे, पर वास्तविकता में इस बात की पुष्टि अभी बाकी है। पिछले औद्योगिक एवं स्वास्थ्य‑संबंधी दुर्घटनाओं में सरकारी निरीक्षणें अक्सर “कागज पर” ही बंद रही हैं। यदि निगरानी के लिए पर्याप्त बजट आवंटन, प्रशिक्षित निरीक्षकों की उपलब्धता व समय‑सापेक्ष कार्यकारी शक्ति नहीं दी गई, तो नए नियम भी केवल कागजी कार्रवाई में बदल सकते हैं।

कुछ विशेषज्ञों ने इस बात पर इशारा किया है कि “जब तक कोई और धूँआ नहीं उठाता, तब तक नियमों का अस्तित्व सवाल रह जाता है।” इस सूखे व्यंग्य से स्पष्ट है कि नीतियों की कठोरता के साथ ही उनके कार्यान्वयन में पारदर्शिता व जवाबदेही का तंत्र भी उतना ही सुदृढ़ होना चाहिए।

सारांशतः, राष्ट्रीय दिशा‑निर्देशों का उद्देश्य अस्पतालों में आग से जुड़ी जोखिमों को प्रणालीगत रूप से कम करना है, पर इसके सफल कार्यान्वयन के लिए केंद्र‑राज्य संरेखण, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और सतत निगरानी की अपरिहार्य आवश्यकता है। यदि इन बिंदुओं को नज़रअंदाज़ किया गया तो नीति‑निर्माताओं द्वारा घोषित “मरीज‑केंद्रित सुरक्षा” मात्र कागज पर ही रह जाएगा।

Published: May 5, 2026