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सुवेन्दु अधिकारी के करीबी सहयोगी चंद्रनाथ राठ की हत्या पर न्याय व्यवस्था में ठहराव
कालरात्रि में उत्तर पश्चिम बंगाल के टाम्लुक क्षेत्र में राजनीतिक कार्यकर्ता चंद्रनाथ राठ को गोली मारकर हत्या कर दी गई। राठ, राज्य की प्रमुख दल में धूम्रपान करने वाले दल के सांसद सुवेन्दु अधिकारी के निकटतम सलाहकार और चुनावी रणनीतिकार थे। स्थानीय पुलिस ने घटना स्थल पर उपलब्ध दावे के अनुसार दो सशस्त्र व्यक्ति को देखी गई सड़कों से भागते हुए पकड़ा, पर वास्तविक क़दम उठाने में देर कर दी।
राठ की मृत्यु के एक घंटे बाद, प्रशासन ने एक प्री-डिक्रीज आदेश जारी किया, जिसमें मामलों की तेज़ जांच का आश्वासन दिया गया, परन्तु नेशनल एंटी‑टेररिस्ट एंटी‑ड्रग फोर्स (NATD) ने भी अधूरी जानकारी और मलिन बौंटन को अपर्याप्त बताया। सीमा पास के इस हिस्से में पिछले कई महीनों में राजनीति‑संबंधी गोलीबारी, दंगों और झड़पों की लहर चल रही थी, जिससे अनुमति‑बिना हथियारों की धारा अब भी शैल को छू रही है।
यह घटना केवल एक व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, बल्कि राज्य के सुरक्षा तंत्र की मौन रही कमजोरी को उजागर करती है। जब एक प्रमुख राजनेता के सहयोगी को सुरक्षित रखने की बात आती है, तो ‘सुरक्षा’ शब्द अक्सर केवल दीवार पर लटकते बैनर में रह जाता है। प्रशासनिक उत्तरदायित्व की इस असंतुलन को दर्शाते हुए, कई विशेषज्ञों ने कहा कि पुलिस को तत्काल फोरेंसिक टीम और सीबीआई को सम्मिलित करना चाहिए था, परंतु निःसंदेह यही अकार्यक्षमता अब भी कायम है।
वर्तमान में, राज्य सरकार ने इस मामले को ‘राजनीतिक काण्ड’ के रूप में वर्गीकृत किया है और कहा है कि न्यायालय की प्रक्रिया बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के पूरी होगी। तथापि, पिछले पाँच वर्षों में समान मामले में कई बार न्यायिक प्रक्रिया की लम्बी अवधि और निष्कर्ष में अस्पष्टता ने सार्वजनिक विश्वास को घटा दिया है। यह विषादपूर्ण वास्तविकता दर्शाती है कि नीतियों में ‘शीघ्र कार्रवाई’ का परितोष अब केवल अल्पकालिक वादे में सीमित रह गया है।
समाजशास्त्री यह भी संकेत देते हैं कि राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिए केवल पुलिस की उपस्थिती पर्याप्त नहीं है; बल्कि कांग्रेस, भाजपा और अन्य क्षुद्र दलों को भी अपनी नीति‑निर्माण शक्ति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। मौजूदा कानून में ‘राजनीतिक हत्याओं के लिए विशेष न्यायपालिका’ की कमी, तथा ‘सुरक्षा सलाहकार’ के अधूरी नियुक्तियां, प्रशासनिक सुस्ती के प्रमुख कारण हैं।
एक शुष्क परन्तु वास्तविक टिप्पणी के साथ कहा जा सकता है कि जब सुरक्षा दस्तावेज़ों में ‘सुरक्षा प्रोटोकॉल’ कागज़ पर लिखी होती है, तो जमीन पर उनका प्रयोग अक्सर ‘भारी बंधक’ बन जाता है। इस तरह के मामलों में केवल राष्ट्रीय स्तर की निगरानी और त्वरित कार्रवाई ही इस त्रासदी को दोहराव से रोक सकती है, अन्यथा राजनीति के रंगमंच पर ऐसी ही घटनाएँ ‘आंदोलन’ का हिस्सा बन कर रह जाएँगी।
Published: May 6, 2026