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Category: भारत

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सुरु नदी त्रासदी: 46 दिन बाद पाकिस्तान ने लद्दाख के नाबालिग का शव भारत को सौंपा

पिछले महीने लद्दाख के तुरन्ती जिले में स्थित सुई नदी के किनारे एक नाबालिग का अचानक लुप्त होना एक बड़ी मानवीय त्रासदी बन गया। खोज‑बीन के कई चरणों के बाद भी बच्चा नहीं मिला, जब तक कि 46 दिन बीतने के बाद पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने मृतकों का शव भारतीय अधिकारियों को वापस नहीं कर दिया।

शव की प्राप्ति भारत‑पाकिस्तान सीमा पर एक औपचारिक प्रक्रिया के तहत हुई, जिसमें दोनों पक्षों के रक्षा प्रतिनिधियों ने व्यक्तिगत रूप से हस्ताक्षर किए। भारत में यह खबर मिलने पर लद्दाख के शासकीय एजेंसियों ने तुरंत स्थिति का विवरण मुख्यालय को भेजा, परन्तु इस लंबी देरी के कई प्रमुख कारण अब स्पष्ट हो रहे हैं।

पहला, सीमावर्ती सहयोग की कमी। 2024‑25 में स्थापित कई द्विपक्षीय आपदा‑प्रबंधन समझौतों का प्रयोग नहीं किया गया। स्थानीय पुलिस, जलविद् और सीमा सुरक्षा विभागों के बीच सूचना‑सेंटरित तंत्र की कमी ने बचाव कार्य को गंभीर रूप से बाधित किया। दूसरा, प्रशासनिक अकुशलता। प्रारम्भिक रिपोर्ट के बाद केंद्र सरकार द्वारा आदेशित “संकट प्रतिक्रिया टीम” की नियुक्ति में दो हफ्तों से अधिक का विलंब हुआ, जिससे समय पर कदम उठाने की संभावनाएँ घट गईं। तीसरा, कागजी कार्यवाही की अथक लकीरें। कई अधिकारियों ने कहा कि “मामले की गंभीरता को समझते हुए भी, खाकी‑कागज की काटनी‑छंटनी ने गुप्त‑समर्थन को धीमा किया”।

इन सभी पहलुओं को देखते हुए यह स्पष्ट है कि नीतिगत ढाँचा मौजूद है, पर उसका प्रयोग व्यावहारिक रूप से नहीं हो पा रहा है। सीमा‑पर स्थित जल निकायों के प्रबंधन में निरंतर सामरिक संवाद की आवश्यकता को नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि भारत‑पाकिस्तान के बीच समय‑सापेक्ष आपदा‑प्रतिक्रिया अभिव्यक्तियों की कमी ने क्षति को दोगुना कर दिया।

सरकार की ओर से अब भी कई सवाल बने हुए हैं: क्यों दो महीने तक एक नाबालिग की खोज में कोई ठोस प्रोटोकॉल नहीं दिखा? क्यों संचार में ज़रूरी “डेटा‑शेयरिंग” उपकरण नहीं चलाए गए? क्या भविष्य में ऐसी ही बाधाएँ दोहराई नहीं जाएँगी? इन प्रश्नों के उत्तर में केंद्र सरकार ने कहा कि “सम्पूर्ण समीक्षा की जा रही है और आवश्यक सुधारात्मक कदम जल्द ही लागू किए जाएंगे”। वास्तविकता यह है कि समीक्षात्मक रिपोर्ट को तैयार करने में भी महीनों का समय लग सकता है, जिससे जवाबदेही की जड़ता और गहरी हो सकती है।

सुरु नदी त्रासदी के बाद के इस “शव‑हस्तांतरण” को एक एकल घटना मानना राजनीतिक सच्चाई नहीं है। यह घटना भूल-भुलैया से भरे प्रशासनिक ढाँचे, सीमाक्षेत्र में मौजूदा अनिश्चितताओं और दोनो देशों के बीच पारस्परिक भरोसे की कमी को उजागर करती है। यदि इस जमीनी स्तर के अभाव को सुधारना है, तो तत्काल एकीकृत आपदा‑प्रबंधन आयोग की स्थापना, वास्तविक‑समय डेटा‑शेयरिंग पोर्टल, और सीमा‑पार बचाव‑बजट की बाध्यकारी व्यवस्था आवश्यक है। अन्यथा, भविष्य में ऐसी त्रासदियों का पुनरावर्तन केवल समय की बात होगी।

Published: May 7, 2026