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सॉमनाथ में बाढ़ के बाद सरकार की धीमी प्रतिक्रिया पर जनता की अटूट भावना
अगस्त 2026 में सॉमनाथ किनारे के उत्तर‑पूर्वी भाग में अचानक आये तीव्र वर्षा ने निचले इलाकों में जल स्तर को नज़रअंदाज करने योग्य स्तर तक पहुंचा दिया। अस्थायी रूप से 1.5 मीटर तक बढ़े जल ने संकटा जालों, किराना दुकानों और लगभग 12 हजार निवासियों के घरों को जलमग्न कर दिया।
प्राथमिक आपदा प्रतिक्रिया के लिये उत्तराधिकारी राज्य disaster management authority (SDMA) ने 12 अगस्त को ही "उच्च जोखिम क्षेत्र" के तौर पर घोषित किया, परंतु वास्तविक कार्यवाही में दो हफ्तों से अधिक समय लग गया। स्थानीय प्रशासन के अधिकारी "भारी बारिश" का हवाला देकर तेज़ी से राहत उपायों को टालते रहे, जबकि केंद्रीय आपदा प्रबंधन निधि (CDMF) से तुरंत आवंटन के लिए आवेदन किया गया था। यह देरी न केवल जीवन-सम्पदा की हानि में बढ़ोतरी का कारण बनी, बल्कि राहत सामग्री की आपूर्ति में अनावश्यक बोझ भी डाली।
जब अंततः 26 अगस्त को राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया दल (NDRF) ने जलनिकासी के लिए पंप और टैंकर पहुँचाए, तब भी कई गांवों में पहुंचने में अतिरिक्त दो‑तीन दिन लग गए। प्रशासनिक बिखराव का एक और ठोस प्रमाण था कि राज्य जल सुविधा विभाग ने इस दौरान पानी के शुद्धिकरण प्लांट की कार्यक्षमता का पुनर्मूल्यांकन किया, परंतु दस्तावेज़ीकरण में त्रुटियों के कारण अनुमति प्रक्रिया आगे बढ़ाने में और एक हफ्ता लग गया। यह अनावश्यक नौकरशाही, नागरिकों की मौलिक अधिकारों को हानि पहुंचाते हुए, नीति‑निर्माताओं की तत्परता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
इन विफलताओं के बावजूद सॉमनाथ के नागरिकों ने खुद को व्यवस्थित बचाव समूहों में संघटित किया। स्वयंसेवक ने स्वंय जल निकासी, प्राथमिक चिकित्सा और अनिवार्य भोजन वितरण में भाग लिया। इस पहल को स्थानीय मीडिया ने "अटूट भारतीय भावना" का प्रतीक बताया, परंतु यह प्रशंसा प्रशासनिक लापरवाही की वास्तविक कीमत को छुपा नहीं सकती।
वर्तमान में राज्य सरकार ने 2026‑27 के बजट में आपदा‑प्रतिक्रिया क्षमताओं को बढ़ाने के लिये अतिरिक्त ₹150 करोड़ का आवंटन किया है, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि बजट आवंटन से अधिक महत्वपूर्ण है निगरानी, समयबद्ध कार्यान्वयन और स्थानीय निकायों के साथ त्वरित समन्वय। यदि इन बिंदुओं पर सुधार नहीं हुआ, तो भविष्य में समान या अधिक गंभीर प्राकृतिक आपदाओं में वही प्रशासनिक सुस्ती दोहराई जा सकती है।
सॉमनाथ की बाढ़ ने यह स्पष्ट किया है कि नीति‑निर्माण में आकस्मिकताओं को अनुमानित कर कार्यवाही का त्वरित क्रम स्थापित करना अनिवार्य है। नागरिकों की स्वैच्छिक पहल सराहनीय है, परंतु यह सरकार की मूलभूत जिम्मेदारी नहीं बन सकती। इससे स्पष्ट होता है कि केवल ‘अटूट भावना’ पर निर्भर रहना, शासन में व्याप्त अकार्यक्षमता और संस्थागत जड़ता को समाप्त करने के लिये पर्याप्त नहीं है।
Published: May 8, 2026