सुप्रीम कोर्ट में पारसी महिला ने धार्मिक अधिकारों की हानि के आदेश को चुनौती दी
नई दिल्ली – एक पारसी महिला ने आज सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में सरकार द्वारा जारी आदेश को असंवैधानिक कहा, जिसके तहत पारसी समुदाय के सदस्यों को कई धार्मिक एवं सामाजिक लाभों से विमुख किया गया। यह याचिका, जो प्रमुख संविधानिक धारा २५ (धर्म की स्वतंत्रता) और २६ (धार्मिक मामलों में स्वायत्तता) के तहत दायर की गई है, प्रशासनिक लापरवाही एवं नीति‑निर्माण की कमी को उजागर करती है।
पिछले महीने केंद्र सरकार ने एक नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रीय जनगणना में पारसी आबादी के निरंतर घटने के कारण इस समुदाय को "धार्मिक रूप से क्षीण" माना जा रहा है और इसलिए इसपर विशेष आरक्षण, फंड एवं धार्मिक स्थलों की उपयोगिता से संबंधी कुछ सुविधाओं को सीमित किया जाएगा। यह आदेश बिना किसी व्यापक सार्वजनिक परामर्श या सामाजिक विज्ञान के आकलन के जारी किया गया, जिससे कई विशेषज्ञों ने इसे “अचानक और एकतरफा” कहा।
मामले की मूल याचिकाकर्ता, स्वयं को ३५ वर्ष की बताया गया, ने बताया कि इस आदेश के कारण उसे अपने पारिवारिक जामदातु को पुनः प्राप्त करने, पारसी मंदिर में अनुष्ठान करने और Zoroastrian Heritage Fund से अनुदान प्राप्त करने से वंचित किया गया। वह तर्क देती हैं कि यह न केवल उसकी व्यक्तिगत धार्मिक अभिव्यक्ति का उल्लंघन करता है, बल्कि सामुदायिक पहचान के अस्तित्व को भी खतरे में डालता है।
प्रशासन की ओर से इस विषय में एक शीघ्र उत्तर दिया गया, जिसमें कहा गया कि यह कदम “संसाधनों की सही दिशा में व्यवस्थित पुनःवितरण” के लिये आवश्यक है और कम होती जनसंख्या के कारण भविष्य में आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। हालांकि, इस प्रकार की तर्कसंगतता को कई सामाजिक विज्ञानियों ने “व्यावहारिक तौर पर पाते ही नहीं” कहा, क्योंकि कोई भी वैध आँकड़ा संगठित परामर्श के बिना इस तरह के निर्णय को समर्थन नहीं देता।
न्यायालय के सामने प्रस्तुत तर्कों ने प्रशासनिक उत्तरदायित्व की दीवार को ठंडा कर दिया है। पिछले दशकों में बहु‑सांस्कृतिक नीति के जटिल प्रश्नों का समाधान कभी‑कभी धुंधला रहा है, और इस बार भी मंत्रालय के अंदरूनी चर्चा के दस्तावेज़ों से पता चलता है कि कई विभागों ने इस आदेश को “अस्थायी” मानते हुए भी उसके कार्यान्वयन की योजना बना ली थी। इस तरह की संस्थागत सुस्ती, जहाँ नीति‑निर्माण के बाद जाँच‑परख नहीं होती, वह एक बड़ी प्रणालीगत कमजोरी दर्शाती है।
पारसी याचिकाकर्ता की इस मुकदमेबाज़ी से यह स्पष्ट हो रहा है कि संविधानिक सुरक्षा को मात्र शब्दों में नहीं, बल्कि प्रभावी प्रशासनिक कार्यान्वयन में भी ढालना आवश्यक है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस आदेश को रद्द कर देती है, तो यह न केवल एक धार्मिक अल्पसंख्यक के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि नीति‑निर्माण में पारदर्शिता, सार्वजनिक परामर्श और प्रशासनिक जवाबदेही की पुनःस्थापना का संदेश भी देगा। सरकारी विभागों को अब इस मुद्दे पर जवाब देना होगा कि क्यों उन्होंने राष्ट्रीय हित के ढोंग में अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों को मार्जिनल बना दिया।
Published: May 6, 2026