सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमिशन और केन्द्र को NEET‑PG प्रवेश नियमों को टेम्पर‑फ़्री बनाने का आदेश दिया
दिल्ली के राष्ट्रीय सर्वोच्च न्यायालय ने 5 मई को नेशनल मेडिकल कमिशन (एनएमसी) और केंद्र सरकार को एक स्पष्ट निर्देश जारी किया: चिकित्सा कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया को ऐसी बनाना कि उसमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न हो सके। यह आदेश अनुशासनहीनता, बार‑बार हो रहे मुकदमों और पोस्ट‑ग्रेजुएट (पीजी) मेडिकल सीटों के बड़े पैमाने पर खाली पड़ने की स्थिति के मद्देनज़र आया।
विगत वर्ष में आरएससीबी परीक्षा‑परीक्षण के आधार पर निर्धारित कट‑ऑफ़ अंक अत्यंत गिरावट के साथ सभी श्रेणियों में कम किए गए। कट‑ऑफ़ में इस हिचकिचाहट का मूल कारण था — कई मेडिकल कॉलेजों में 30 % से अधिक पीजी सीटें खाली रहना, जो न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति को बाधित कर रहा है, बल्कि प्रतिस्पर्धी छात्रों के भविष्य को भी अस्थिर कर रहा है। इस विफलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्यक्ष तौर पर संस्थागत उत्तरदायित्व पर सवाल उठाया।
कोर्ट के ज्ञापन में यह कहा गया कि मौजूदा चयन प्रक्रिया में ‘डिजिटल साक्षरता, क्रिमिनल बकाया और पात्रता मानकों की अनियंत्रित जाँच’ जैसे मूलभूत पहलू अक्सर अनदेखी रह जाते हैं। परिणामस्वरूप, अनगिनत छात्र‑अभ्यर्थी कोर्ट में पहुंचते हैं, जहाँ वे अपने प्रवेश को रद्द या संशोधित करने के आदेश के लिये कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। अदालत ने कहा, “समानता और पारदर्शिता के बिना कोई भी परीक्षा विश्वसनीय नहीं रह सकती”।
नियमों को टेम्पर‑फ्री बनाने के लिए एनएमसी को कई बिंदुओं पर काम करने का निर्देश दिया गया:
- प्रवेश प्रक्रिया में ब्लॉकचेन‑आधारित डेटा संग्रहण एवं सत्यापन को लागू करना, जिससे व्यक्तिगत दस्तावेज़ों में फेरबदल असंभव हो।
- स्वतंत्र तृतीय‑पक्ष ऑडिट संस्थान द्वारा सालाना प्रक्रियात्मक निरीक्षण, जिससे किसी भी ‘लाल‑धागे’ को यथाशीघ्र चिन्हित किया जा सके।
- रिपोर्ट‑आधारित ‘कट‑ऑफ़ अल्गोरिद्म’ को पुनः डिजाइन करना, जिसमें प्रत्येक पात्रता मानकों को वज़नित स्कोर के आधार पर तय किया जाए, बजाय एकल अंक‑थ्रेशहोल्ड के।
इन निर्देशों पर ब्यूरोक्रेसी की प्रतिक्रिया में “संविधानिक कर्तव्य” शब्द दोहराया गया, परन्तु व्यावहारिक कार्यान्वयन की दिशा में ठोस टाइम‑लाइन अभी भी अस्पष्ट है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘रिपोर्ट‑कार्ड’ केवल इतना ही दिखाता है कि नीति‑निर्माण में नियामक पतन कितना गहरा हो गया है। “जब तक सिस्टम की नींव में अनियमितता का प्रवाह नहीं रुकेगा, तब तक कट‑ऑफ़ कम करना या बढ़ाना केवल ‘सतही उपचार’ रहेगा,” एक सार्वजनिक स्वास्थ्य विश्लेषक ने टिप्पणी की।
अंत में, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि एनएमसी और केन्द्र 90 दिनों के भीतर इन सिद्धांतों को निष्पादित नहीं करते, तो प्रक्रिया की निगरानी के लिये एक विशेष ‘न्यायिक निरीक्षण मंडल’ स्थापित किया जा सकता है। यह दंडात्मक चेतावनी प्रशासनिक ढीलेपन के विरुद्ध एक आवश्यक कदम है, परन्तु इसकी सच्ची प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नीति‑निर्माता और कार्यकारियों के बीच जवाबदेही के बंधन कितनी दृढ़ता से लागू होते हैं।
Published: May 5, 2026