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Category: भारत

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सुप्रीम कोर्ट ने धर्म संबंधी मामलों में समय की बर्बादी पर सवाल उठाए

न्यायालय के सामने आज के दिन बढ़ते हुए धार्मिक मामलों की सूची ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट को चिंतित कर दिया। प्रमुख न्यायाधीश ने खुले तौर पर यह सवाल उठाया कि क्या कोर्ट को उन मामलों में अनावश्यक समय देना चाहिए जो अक्सर सामाजिक‑धार्मिक विवादों तक सीमित रह जाते हैं, जबकि न्यायिक बाड़ा पहले से ही भारी है।

पिछले कुछ वर्षों में धर्म‑संबंधी याचिकाओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। मंदिर‑प्रवेश, मस्जिद‑विलय, धार्मिक संस्थानों की संपत्ति विवाद आदि जैसे मुद्दे न्यायिक प्रक्रिया को थकाए हुए हैं। इस प्रवाह ने न केवल मौजूदा बैकलॉग को और बढ़ाया है, बल्कि न्यायिक निर्णयों की विश्वसनीयता को भी अस्थिर किया है।

सरकारी एवं विधायी पक्ष इस स्थिति पर सन्निहित है। किसी स्पष्ट नीति या विधेयक का अभाव है जो धार्मिक विवादों को व्यापक सामाजिक‑आर्थिक विवादों से अलग कर सके। इस कारण, अदालतें अक्सर मौजूदा अनुच्छेदों की ही व्याख्या करती हैं, जिससे प्रक्रिया लंबी और जटिल बनती है। प्रशासनिक लापरवाही और संस्थागत सुस्ती ने इस खाई को और गहरा किया है।

नागरिकों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कई बार धार्मिक मामले न्यायिक पेंडिंग लिस्ट में फँसकर सामान्य नागरिकों के अधिकारों में देरी उत्पन्न कर देते हैं—जैसे भूमि पुनःप्राप्ति, व्यक्तिगत सुरक्षा, और सामाजिक समानता। इस कारण न्यायिक प्रणाली पर भरोसा घट रहा है, जबकि जनता के पास राहत पाने के लिए वैकल्पिक मंचों की कमी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समस्या का समाधान केवल न्यायालय के अल्पकालिक कदमों से नहीं हो सकता। एक व्यापक नीति दिशा, स्पष्ट विधान, और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के तहत निरंतर निरीक्षण आवश्यक है। यदि इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो न्यायिक प्रणाली की क्षमताहीनता ही सतत दर्द बिंदु बने रहने की संभावना है।

Published: May 7, 2026