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Category: भारत

सुप्रीम कोर्ट ने दो अहम धारा उलट दी, एसिड हमले के विरोधी कानून में बदलाव

नई दिल्ली – 5 मे 2026 को संवैधानिक न्यायालय ने एसिड हमले को रोकने हेतु स्थापित दो मुख्य धाराओं को रद्द कर दिया। यह निर्णय, 2013 के आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम 7 वर्ष पहले लागू किए गए दो प्रमुख प्रावधानों – (i) एसिड हमले के लिये अनिवार्य न्यूनतम दंसव 10 वर्ष और (ii) पीड़ित को राज्य के ‘एसिड अटेकर विक्टिम्स रिलीफ़ फंड’ से मुआवजा देना – को निरस्त कर रहा है।

कॉलम में संगठनों, राज्य प्रशासन और क्षति‑सहायता योजना के बीच दशकों से चल रहे टकराव को देखते हुए, न्यायालय ने दो बिंदुओं को प्रमुख कारण बताया। प्रथम, अनिवार्य न्यूनतम दंसव न्यायिक विवेक को सीमित करता है, जिससे प्रत्येक मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को नहीं देखा जाता। द्वितीय, राज्य को प्रतिपूरक भुगतान की बाध्यता, अपराधियों की आर्थिक जिम्मेदारी को कमजोर कर देती है तथा सार्वजनिक बजट पर अनावश्यक दबाव बनाती है।

यह रिवर्सल, कई सामाजिक संगठनों और पीड़ित सहायता समूहों द्वारा लाए गए अभिरुचि‑भरे दावों के बाद आया, जिन्होंने कहा था कि मौजूदा प्रावधान न केवल असंगत थे, बल्कि कई मामलों में पीड़ित को उचित राहत नहीं मिल पाई। उन समूहों का कहना था कि राज्य‑संबन्धित फंड को प्राथमिकता देने से वास्तविक अपराधी पर वित्तीय दायित्व नहीं थोपा गया और इस प्रकार ‘अन्यायिक अनुबंध’ का माहौल बन गया।

परन्तु इस निर्णय की आलोचना भी तीव्र रूप से उभरी। कई कानूनी विशेषज्ञों ने इंगित किया कि अनिवार्य न्यूनतम दंसव हटाने से दंड के कठोर स्वरूप घट सकता है, जबकि पीड़ितों को न्याय मिलने की संभावना घटेगी। इसके अतिरिक्त, राज्य द्वारा मुआवजा जारी रखने से सरकारी विभागों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा, और इस बोझ को कम करने के लिये कई राज्य अब ‘वित्तीय स्वायत्तता’ के आधार पर फंड को सीमित कर सकते हैं।

सरकार ने इस फैसले पर शीघ्र प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केंद्र और राज्य दोनों ही मौजूदा ‘एसिड अटेकर विक्टिम्स रिलीफ़ फंड’ को पुनर्संरचना कर, प्रभावी निगरानी और लक्ष्य‑निर्धारित disbursement तंत्र स्थापित करेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ‘व्यक्तिगत उत्तरदायित्व’ को सुदृढ़ करने के लिये विशेष विधायी संशोधनों की तैयारी चल रही है, जिसमें अपराधी की आर्थिक क्षमतानुसार मुआवजा निर्धारण पर बल दिया जाएगा।

वहीं, प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दे को उजागर करते हुए स्वतंत्र नीति‑विश्लेषकों ने कहा कि यह उलटाव न सिर्फ अधिनियम की मूल भावना को कमजोर करता है, बल्कि न्यायपालिका की नीति‑निर्माण प्रक्रिया में अव्यवस्था को भी प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि नई नीति स्पष्ट रूप से लागू नहीं हुई, तो एसिड हमले की संख्यात्मक परिमाण में वृद्धि की संभावना है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के गंभीर संकेतक हैं।

संक्षेप में, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने न केवल दो प्रमुख कानूनी प्रावधानों को समाप्त किया, बल्कि प्रशासनिक दक्षता, नीति‑निर्माण की स्पष्टता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व पर नई बहस को जन्म दिया है। आगे देखना यह होगा कि केंद्र व राज्य दिग्गज इस अंतराल को कैसे पाटते हैं, तथा क्या वैकल्पिक तंत्र पीड़ितों को वास्तविक राहत और दंडात्मक प्रभाव प्रदान करने में सक्षम सिद्ध होते हैं।

Published: May 5, 2026