सुप्रीम कोर्ट ने कहा: साबरिमाला का मूल पीआईएल खारिज किया जाना चाहिए
नई दिल्ली – 6 मई, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक असामान्य टिप्पणी में कहा कि 2018 में सुनाए गए पहले सार्वजनिक हित याचिका (पीआईएल) को प्रारम्भ से ही खारिज कर देना चाहिए था। यह टिप्पणी उस मौजूदा मामले के सिलसिले में आई, जिसमें भारतीय न्यायिक प्रणाली को फिर से सैबरिमाला मंदिर के प्रवेश‑प्रवेश नियमों को लेकर चुनौती का सामना करना पड़ा।
पृष्ठभूमि में 2018 का वह परिवर्तनकृत फैसला है, जहाँ पाँचान्ना उच्च न्यायालय ने ‘स्त्री-शौच’ प्रतिबंध को निरस्त कर महिलाओं को 10‑20 वर्ष आयु वर्ग सहित मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी। इस फैसले के बाद कई सामाजिक‑धार्मिक संगठनों ने संविधानिक निराकरण की मांग में एक मूल पीआईएल दायर किया, जिसमें कहा गया था कि निर्णय प्रक्रिया में विधिक त्रुटियाँ थीं और सामाजिक संतुलन बनाए रखने हेतु प्रतिबंध फिर से लागू किया जाना चाहिए।
वह मूल पीआईएल, जो 2020 के शुरुआती चरण में दायर किया गया था, को कई बार पुनःस्थापित किया गया, परन्तु न्यायालय ने उसे कई बार अटकते‑बिलंबी के कारण स्वीकार किया ही नहीं। 2026 में अंतिम सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायालय ने उल्लेख किया कि इस याचिका के प्रारम्भिक चरणों में प्रक्रियात्मक त्रुटियों, असंगत प्रस्तुतियों और अधूरी रिपोर्टों के कारण उसे खारिज किया जाना चाहिए था। न्यायालय ने इस बात को “परिचालनात्मक अक्षम्यताओं” के रूप में वर्गीकृत किया।
संबंधित पक्षों की प्रतिक्रियाएँ भी विविध थीं। त्रिपुरा देवस्वामि बोर्ड, जो सैबरिमाला के प्रबंधन के लिये जिम्मेदार है, ने कहा कि वह न्यायिक दिशा‑निर्देशों का पूर्ण सम्मान करता है, परन्तु प्रशासनिक स्तर पर “नीति‑निर्माताओं की अस्पष्टता” के कारण कार्यान्वयन में कठिनाइयाँ आती हैं। केरल राज्य सरकार ने भी न्यायालय के इस टिप्पणी को “विचार‑संतुलित” कहा, परन्तु बताया कि उन्होंने पिछले पाँच वर्षों में प्रवासियों के लिये पर्याप्त सुरक्षा एवं पर्यवेक्षण व्यवस्था नहीं बनाई।
न्यायिक टिप्पणी के बाद, कई साहित्यकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने यह प्रश्न उठाया कि न्यायपालिका को कभी‑कभी नीति‑निर्माण की भूमिका क्यों सौंपी जा रही है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की “विचारधारा‑की‑जाँच” से प्रशासनिक जवाबदेही में सुधार की संभावना तो है, परन्तु यह भी दर्शाता है कि मौजूदा विधायी तंत्र और सम्बद्ध संस्थाओं में स्पष्ट दिशा‑निर्देशों की कमी है।
यह घटना दर्शाती है कि भारतीय शासन प्रणालियों में न्यायिक प्रक्रिया, राज्य‑स्तरीय प्रशासन और धार्मिक‑सांस्कृतिक संस्थानों के बीच तालमेल कितनी देर तक टूटा रह सकता है। जब न्यायालय ही यह “उस पीआईएल को खारिज किया जाना चाहिए था” कहता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि नीति‑निर्माण में पारदर्शिता, समयबद्धता और प्रभावी निगरानी की अत्यंत आवश्यकता है। ऐसे परिदृश्य में नागरिकों का विश्वास केवल तभी बचा रहेगा जब विधायी और कार्यकारी शाखाओं को स्पष्ट, आपसी समझ और जवाबदेह ढांचा तैयार करके इस तरह की “पुनरावृत्ति” को रोकना होगा।
Published: May 6, 2026