सुप्रीम कोर्ट ने एमटीपी अधिनियम में संशोधन की माँग की, अनिच्छित गर्भधारण को रोकने की नीति में खामी उजागर
दिल्ली के सर्वोच्च न्यायालय ने 5 मई 2026 को अपने एक बेंच में यह स्पष्ट किया कि मौजूदा मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम को तत्काल संशोधित करना आवश्यक है, ताकि अनिच्छित गर्भधारण को प्रतिबंधित करने की नीति‑प्रभुता साकार हो सके। यह आदेश कई सामाजिक संगठनों, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और महिला अधिकारों की रक्षा करने वाले NGOs द्वारा दायर याचिकाओं के बाद आया, जिसमें मौजूदा विधेयक की सीमाओं को ‘भावनात्मक’, ‘भौगोलिक’ और ‘सामाजिक’ रूप में वर्णित किया गया था।
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वायत्तता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने कहा कि मौजूदा MTP कानून, जो पहली बार 1971 में पास हुआ था, उसमें गर्भकाल की सीमाएँ (पहले 20 सप्ताह, बाद में 24 सप्ताह) और अनुशासनिक प्रक्रियाएँ आज की स्वास्थ्य‑परिदृश्य और सामाजिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खातीं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रमाणित चिकित्सकों की कमी, निजी क्लीनिकों में अनियंत्रित प्रथा, तथा सामाजिक‑आर्थिक स्थिति के आधार पर महिलाओं के अधिकारों में अंतर, इस अधिनियम की प्रभावशीलता को रूकी हुई बनाते हैं।
मुख्य बिंदु जिन पर न्यायालय ने प्रकाश डाला:
इन बिंदुओं के प्रकाश में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 10 मई को एक अभिव्यक्तिपत्र जारी किया, जिसमें कहा गया कि वे “संबंधित नियमों के पुनरावलोकन” के तहत एक विशेषज्ञ समिति स्थापित करेंगे, परन्तु इसके ठोस समय‑सीमा या कार्य‑राज्य की परिभाषा अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। इस प्रकार, नीति‑निर्माण प्रक्रिया में दो‑तीन दिन के अंतराल में अदालत की टिप्पणी और सरकार की प्रतिक्रिया के बीच एक ख़ालीपन रह गया है, जो सार्वजनिक अपेक्षाओं को निराश करने का जोखिम रखता है।
प्रशासनिक लापरवाही के स्वर में विशेषज्ञों ने कहा है कि केवल ‘समिति बनाना’ शब्द ही अब तक के कई सुधारों की शून्य‑कार्रवाई को छुपाने का उपाय बन चुका है। स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्व सचिव ने कहा, “नियमों को लिखने से पहले उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए; नहीं तो यह अधिनियम कागज़ी ढांचा ही रहेगा।” यह टिप्पणी निपटारू उत्तर के रूप में देखी जा रही है, क्योंकि पहले भी कई बार स्वास्थ्य नीति में ‘ड्राफ्ट‑स्टेज’ तक पहुँच कर निष्क्रियता ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रतिकूल प्रभावित किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि मंत्रालय को 30 दिन के भीतर संशोधित ड्राफ्ट प्रस्तुत करना होगा, जिसमें उपर्युक्त चार प्रमुख पहलुओं को सम्मिलित किया जाना अनिवार्य है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि संशोधन में देरी जारी रही, तो वह असंगतता के कारण राज्य‑परिसर में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार रखेगा। यह दिशा‑निर्देश अभिलक्षण रूप में कार्यकारी संस्थानों को जवाबदेह बनाने की दिशा में एक स्पष्ट कदम है, परन्तु तत्काल कार्यवाही के अभाव में यह भी दर्शाता है कि भारतीय शासन में नीति‑निर्माण और न्यायिक आदेश के बीच अक्सर एक मौन अंतराल रहता है।
अंततः, इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि अनिच्छित गर्भधारण को रोकने के लिये केवल कानूनी शब्दावली ही नहीं, बल्कि बुनियादी स्वास्थ्य ढाँचे, सामाजिक शिक्षा और नियामक जवाबदेही की आवश्यकता है। यदि सरकार इस दिशा में तत्परता नहीं दिखाती, तो भविष्य में अधिनियम के संशोधन के लिये फिर से न्यायालय की अगली बेंच पर आना पड़ेगा—और वह भी तब, जब अनगिनत महिलाएँ इस अधिनियम की वास्तविक सुरक्षा से वंचित रह चुकी होंगी।
Published: May 5, 2026