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Category: भारत

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सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के चुनाव आयोग नियुक्ति कानून को चुनौती दी

नई दिल्ली – 7 मई, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्त्वपूर्ण मामला सुना, जिसमें 2023 में पारित किए गए चुनाव आयोग (नियुक्ति) विधेयक की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया। इस विधेयक ने अनुच्छेद 324 के तहत निर्मित स्वतंत्रता के प्रतीक चुनाव आयोग की कार्यवाही को प्रभावित करने वाला प्रावधान जोड़ा – प्रमुख न्यायालयी अधिकारी के स्थान पर एक केंद्रीय मंत्री को चयन मंडल में शामिल करके नियुक्तियों का निर्णय लेना।

विधानपरिदृश्य को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता कई नागरिक संगठनों और पूर्व न्यायाधीशों के समूह हैं, जिन्होंने दलील दी कि इस परिवर्तन से चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता को गंभीर क्षति पहुंची है। उनके अनुसार, यह प्रावधान न केवल न्यायिक संतुलन को बिगाड़ता है, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध भी जाता है।

साबित तथ्यों से स्पष्ट है कि इस विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया में लोकतांत्रिक बहस का अभाव रहा। 2023 के बजट सत्र के दौरान, कई सांसदों को अनुशासनात्मक कारणों से निलंबित कर दिया गया, जिससे चयन प्रक्रिया पर कोई वास्तविक चर्चा नहीं हो सकी। बशर्ते, ऐसा कहा गया कि “वास्तव में संसद में इसपर कोई बहस नहीं हुई।” इस अकारण निलंबन ने विधेयक को तेज गति से पारित कर दिया, जिससे राजनैतिक बहु‑पक्षीय चर्चा का अवसर नष्ट हो गया।

कोर्ट ने इस संदर्भ में यह प्रश्न उठाया कि क्या वह विधिक रूप से संसद को नियमावली बनाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकता है। न्यायालय के प्रमुख न्यायाधीश ने विशद रूप में कहा कि “सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य है संविधान का संरक्षण, परन्तु संसद की शाब्दिक संवैधानिक शक्ति को निर्देशित करना… यह सीमा पार कर सकता है।” यह टिप्पणी प्रशासनिक अकार्यक्षमता और संस्थागत लापरवाहियों को उजागर करती है, जहाँ विधायी प्रक्रिया स्वयं में विफलता की ओर ले जा रही है।

नीति‑निर्माण की इस विफलता के कई नतीजे स्पष्ट हैं। प्रथम, चुनाव आयोग की निर्णय‑निर्धारण शक्ति पर सरकार का प्रभाव बढ़ेगा, जिससे आगामी चुनावों में निरपेक्षता के प्रश्न उदित होंगे। द्वितीय, सार्वजनिक विश्वास में गिरावट आएगी, क्योंकि नागरिक अब एक ऐसे निकाय पर भरोसा करेंगे जो राजनीतिक नियुक्तियों से प्रभावित हो। तृतीय, यह घटना संस्थागत सुस्ती का संकेत है; जब संसद में बहस‑परिचर्चा की जगह राजनैतिक व्यवधान हो, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूलभूत स्तम्भ कमजोर पड़ते हैं।

सरकार ने अभी तक इस चुनौती पर आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है, परंतु पिछले वर्षों में समान विधायी परिवर्तनों को ‘परिवर्तन’ कहा गया था, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव स्पष्ट होता है। देर तक अनदेखा रहने वाले इस मुद्दे पर नागरिक समाज ने त्वरित प्रतिवाद की माँग की है, यह तर्क देते हुए कि “कानून बनता है, परन्तु राजनीति नहीं, इसका प्रमाण जीवन में महसूस किया जाता है।”

सुप्रीम कोर्ट के इस सुनवाई के परिणाम की प्रतीक्षा में, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिरता और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न उजागर होता जा रहा है। यदि कोर्ट विधेयक को अंसंगत घोषित करती है, तो यह संसद को भविष्य में इसी तरह की ‘त्वरित रूप से पारित’ विधियों से बचने का एक संकेत देगा। अन्‍यथा, यह निर्णय प्रशासनिक निरक्षरता और नीति‑निर्माण में मौन सहमति को बल देगा, जिससे भारतीय लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

Published: May 7, 2026