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Category: भारत

सुप्रीम कोर्ट के मान्यकों की संख्या 34 से बढ़कर 38 की जाएगी

भारत सरकार ने 6 मई 2026 को घोषणा की कि उच्चतम न्यायालय के मान्यकों (जज) की कुल संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी जाएगी। यह निर्णय विधायी प्रक्रिया के माध्यम से आधिकारिक रूप से लागू होगा, जिसमें संविधान में अनुच्छेद 124 के संशोधन की आवश्यकता होगी।

परिवर्तन के पीछे मुख्य रूप से दो प्रशासनिक उद्देश्यों को दर्शाया गया है: लंबित वादों की बढ़ती सूची को सुलझाने के लिये बेंच क्षमता में वृद्धि और न्यायिक कार्यभार को संतुलित करने हेतु शासकीय नीति‑निर्माण को सुदृढ़ करना। हालांकि, इस प्रस्ताव को जारी करने की गति स्वयं प्रशासनिक अक्षमता का संकेत देती है। न्याय मंत्रालय ने पहले 2024‑25 में इसी सुधार के लिये मसौदा बिल प्रस्तुत किया था, परंतु विधायिका में अनिर्णय और कई बार बदलाव के अभाव ने कार्यान्वयन को कई वर्षों तक रोका।

पुरानी प्रणाली में 34 मान्यकों से 70,000 से अधिक लंबित मामले थे, जबकि नई योजना के तहत लगभग 10‑12 प्रतिशत मामलों की डिलीवरी की उम्मीद है। यह आशावादी आंकड़े सरकार के “न्यायिक सुधार” के दावे को समर्थन देते हैं, परन्तु इसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता कि नियुक्तियों की प्रक्रिया कई बार राजनीतिक दबाव और चयनात्मक मापदंडों के कारण देरी का शिकार रही है। पिछले दशक में केवल 14 नई नियुक्तियों ने प्रक्रिया को पूर्ण किया, जबकि कई बार अनुशंसित उम्मीदवारों को लौटा दिया गया।

नीति‑निर्माताओं का तर्क है कि अतिरिक्त चार मान्यकों से न केवल मौजूदा मामलों की कार्यसूची आसान होगी, बल्कि भविष्य के जटिल मामलों के लिये विशेष पैनलों की स्थापना भी सम्भव हो जाएगी। परन्तु एक व्यंग्यात्मक परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि बेंचों की गिनती बढ़ाते‑बढ़ाते यह प्रश्न उठता है कि क्या अदालत में खाली कुर्सियों की संख्या भी सार्वजनिक खर्च का एक नया आयाम बन जाएगी।

सरकारी पक्ष ने कहा है कि नियुक्तियों के लिये एक पारदर्शी आयोग स्थापित किया जाएगा, जिसमें वरिष्ठ न्यायविद्, वरिष्ठ सेवाकर्मियों और स्वतंत्र विशेषज्ञों का सम्मिश्र समूह रहेगा। अभी तक इस आयोग की संरचना और कार्यविधि सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं की गई है, जिससे संस्थागत सुस्ती और जवाबदेही की कमी पर सवाल खड़े होते हैं।

समग्र रूप से देखा जाये तो मान्यकों की संख्या में वृद्धि एक सकारात्मक संकेत है, परंतु इसका वास्तविक प्रभाव तभी स्पष्ट होगा जब नियुक्तियों में समयबद्धता, चयन की निष्पक्षता और प्रशासनिक प्रक्रिया में पारदर्शिता को सुदृढ़ किया जाये। अन्यथा यह कदम केवल गणितीय वृद्धि रहेगा, जबकि प्रणालीगत समस्याएँ—जैसे केस बैकलॉग, चयन में राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रक्रिया‑कुशलता की कमी—जारी रहेंगे।

Published: May 6, 2026