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Category: भारत

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स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ तकनीकी रूप से खुला, पर भारतीय नौवहन ठप

अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़, जो दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में से एक है, आधिकारिक तौर पर खुला रहने के बावजूद भारतीय मालगाड़ी और तेल टैंकरों के लिए कार्यरहित स्थिति में पहुँच गया है। पिछले हफ्तों में कई भारतीय जहाज़ों को अनपेक्षित रूट बदलना, थ्रॉटल गति घटाना और कुछ मामलों में अस्थायी रूप से रुकना पड़ा, जिससे संचालन लागत में 15‑20 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज हुई है।

सेफ़र आधिक्य की गिरावट का मुख्य कारण पिछले दो वर्षों में इस जलधारा में हुए कई हाइवे‑डॉमिनैशन घटनाएँ हैं, जिनमें मिसाइल की बैंडिंग, ड्रोन हमले और जहाज़ों को अभिप्रेत नहीं करने वाले जलयान द्वारा निकटतम पासिंग शामिल हैं। इन घटनाओं ने समुद्री चालक दल के मनोबल को काफी क्षीण कर दिया है; कई अनुभवी कप्तानों ने सुरक्षित जल क्षेत्रों में वैकल्पिक मार्ग अपनाने की इच्छा व्यक्त की है, भले ही इससे यात्रा समय दो‑तीन दिन तक बढ़ जाता है।

ऐसे परिदृश्य में भारतीय सरकार का जवाबदेही स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। समुद्री मामलों के केंद्रीय मंत्रालय ने कई बार ‘सुरक्षा के तहत’ रूट को खुले रहने की पुष्टि की, परंतु वास्तविक समय में जहाज़ों को मार्गदर्शन, एंटी‑ड्रोन सहायता या अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा बलों के त्वरित तैनाती में ठहराव स्पष्ट है। भारत ने अपना समुद्री रक्षा बिंब ‘पॉइंट‑डिफेंस’ के तहत क्षेत्रीय स्काउटिंग बढ़ाने का उल्लेख किया था, परंतु इस योजनाबद्ध अभ्यास की वास्तविक परिणति अभी तक सामने नहीं आई।

वित्तीय पहलू से देखे तो शिपिंग कंपनियों को बीमा प्रीमियम में अचानक 30‑40 प्रतिशत की वृद्धि झेलनी पड़ रही है, जबकि सरकार ने कोई विशेष राहत पैकेज या कर‑छूट का प्रावधान नहीं किया। प्रशासनिक सुस्ती का यह उदाहरण यह भी दर्शाता है कि राष्ट्रीय नीति‑निर्माण इकाइयाँ जोखिम‑आधारित प्रबंधन के बजाय औपचारिक मान्यताओं में फँसी हुई हैं।

भारतीय समुद्री उद्योग के प्रतिनिधि संघ (नैशनल शिपऑनर्स बॉडी) के प्रमुख ने कहा कि “तकनीकी तौर पर मार्ग खुला है, पर यात्रियों और मालभाड़े दोनों के लिए संचालन असंभव हो गया है”। यह बयान न केवल वर्तमान संकट की वास्तविकता को उजागर करता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को अपने maritime‑security के दायित्वों को साकार करने में देर हो गई है।

सारांश में, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ की “तकनीकी खुली” स्थिति एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है। जब तक समुद्री मंत्रालय सॉलिड ऑपरेशनल ढाँचा, त्वरित डिप्लोमैटिक कदम और उद्योग‑सहायता पॉलिसी नहीं पेश करता, भारतीय शिपिंग को निकट भविष्य में उच्च लागत, समय‑हानि और मनोबल की गिरावट जैसी समस्याओं का सामना करना ही पड़ेगा। यह घटना प्रशासनिक अक्षमता, नीति‑निर्माण में गतिहीनता और सार्वजनिक जवाबदेही की कमी का स्पष्ट नमूना है, जिसका मूल्यांकन समय पर किया जाना अपरिहार्य है।

Published: May 6, 2026