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सीएजी ने कहा: शहरी गतिशीलता में बाधा शासन की अकार्यक्षमता
नई दिल्ली – 7 मई 2026 को जारी किए गए अपने वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में नियंत्रक और लेखा परीक्षक (सीएजी) ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत के शहरी क्षेत्रों में यात्रा को सरल बनाने के सभी प्रयासों में सबसे बड़ा बाधा सूखा, तुच्छ और अक्सर बेमतलब शासकीय जाल है। यह निष्कर्ष कई प्रमुख शहरों—जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता—में सार्वजनिक परिवहन, सड़कों और साइलेंट ज़ोन के विकास के प्रतीकात्मक प्रोजेक्ट्स के धीमे‑धीमे टुटने से साक्ष्य‑सहित बनाया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया कि मौजूदा नियामक और कार्यान्वयन ढाँचे में दो प्रमुख खामियाँ हैं:
- इंटर‑एजेंसी समन्वय की कमी: एक नई मेट्रो लाइन को मंजूरी मिलने से लेकर भूमि अधिग्रहण, ठेकेदार चयन और अंतिम परीक्षण तक का औसत समय 5 से 7 वर्ष तक बढ़ जाता है। यही कारण है कि कई मेगा‑प्रोजेक्ट्स का प्रारम्भिक लक्ष्य‑तारीखें “विलंबित” की श्रेणी में बार‑बार आती रहती हैं।
- जवाबदेही‑पर‑आधारित निगरानी की अनुपस्थिति: कई शहरों में स्थापित “स्मार्ट सिटी” अधिकारियों के पास बजट के 15 प्रतिशत से अधिक अपरिचित खर्चीले आइटमों की पहचान नहीं हुई, जबकि वार्षिक लेखा‑जांच में उनसे जुड़े कोई सुधारात्मक कदम नहीं दिखे।
इन समस्याओं को हल करने के लिए, सीएजी ने कई ठोस सिफ़ारिशें पेश कीं – एकीकृत “सिंगल‑विंडो” मंजूरी मंच, परियोजना‑आधारित वित्तीय ट्रैकिंग, तथा प्रदर्शन‑आधारित अनुबंधों का निर्माण। परंतु सरकारी जवाब‑देही में दिखाई देने वाली “संस्थागत सुस्ती” इस बात का संकेत देती है कि नीति‑निर्माताओं ने अक्सर ही मौखिक तौर पर ही इन पहलुओं को स्वीकार किया है, जबकि वास्तविक कार्यान्वयन में ठोस कदम नहीं उठाए गए।
वास्तविकता यह है कि नागरिकों की दैनिक यात्रा पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। दिल्ली में औसत यात्रा समय 30 मिनट से 45 मिनट तक बढ़ गया है, जबकि मुंबई में बसों की विरासत‑स्थिति के कारण प्रतीक्षा समय दो‑तीन गुना बढ़ गया है। ऐसा केवल दक्षता‑घटा नहीं, बल्कि आर्थिक हानि – अनुमानित 2026 में शहरी कार्यबल का उत्पादकता नुकसान 2.3 अर्ब रुपये से अधिक – का परिणाम है।
शासन के दावों की तुलना में वास्तविक स्थिति का अंतर अब “विचार‑धारा” बन चुका है। कई केंद्र और राज्य सरकारों ने नई “इन्फ्रास्ट्रक्चर फ्रेमवर्क” की घोषणा की, परन्तु उसकी पूर्ति में “भौगोलिक बिखराव” और “प्रक्रियात्मक जटिलता” का स्वर आज भी गूंजता है। जैसा कि सीएजी ने सूखे शब्दों में कहा: “जब तक शासन के भीतर एकजुटता नहीं बनती, तब तक शहरी गति‑संधि का कोई भी वादा सिर्फ़ शब्दों का शिल्प बना रहेगी।”
संक्षेप में, शहरी गतिशीलता को सहज बनाने की नीति‑राह में आज शासन ही सबसे बड़ी बाधा बन कर उभरा है। यदि इस कड़वी सच्चाई को अनदेखा किया गया तो अगले साल भी वही अटकलें और वही देरी देखी जाएगी – और वह केवल नागरिकों की हताशा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की गति को भी धीमा कर देगा।
Published: May 7, 2026