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साइबर अपराध में 18% बढ़ोतरी, धोखाधड़ी बन गई प्रमुख कारण
भारत में साइबर अपराध के मामलों में इस वर्ष 18 प्रतिशत की इजाफा दर्ज किया गया है, और इस व्रद्धि के पीछे सबसे अधिक योगदान धोखाधड़ी (फ्रॉड) की घटनाओं ने दिया है। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा एजेंसी (CERT‑India) और दिल्ली पुलिस के साइबर अपराध शाखा द्वारा जारी तालिका के अनुसार, 2025‑26 की वित्तीय वर्ष में कुल साइबर अपराध 1,84,000 मामलों से बढ़कर 2,17,120 तक पहुंच गया, जिसमें वित्तीय धोखाधड़ी ने 38 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी ली।
साइबर अपराध के दो प्रमुख वर्ग—हैकिंग और डेटा चोरी—को निरंतर बढ़ते देखी गई संख्या के बावजूद, धोखाधड़ी की विस्तारित रूपरेखा ने न्यायिक प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। मोबाइल वॉलेट, ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म और सरकारी डिजिटल सेवाओं के बढ़ते प्रयोग ने अपराधियों को वैध लेन‑देनों के आड़ में छलिया (सिंथेटिक फॉर्म) तैयार करने का अवसर दिया है। इस प्रवृत्ति के कारण पीड़ितों की शिकायतों में औसत आर्थिक नुकसान पहले के वर्ष के 1.2 लाख रुपये से बढ़कर 2.1 लाख रुपये तक पहुंच गया।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया के संदर्भ में, प्रदीप सिंह, मुख्य सूचना अधिकारी (CIO), भारत सरकार ने घोषणा की कि मौजूदा साइबर सुरक्षा नीति के तहत 2024 में स्थापित ‘राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति’ को पुनः मूल्यांकन किया जाएगा। हालांकि, नीति पुनरावलोकन की प्रक्रिया में प्रमुख चुनौतियों में डाटा शेयरिंग के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं होना, राज्य‑स्तरीय पुलिस इकाइयों में तकनीकी कौशल की कमी और केंद्रीकृत फ़िरोज़ी (फ़ॉरेंसिक) लैब्स की अपर्याप्त संख्या प्रमुख हैं।
वहीं, साइबर अपराध नियंत्रण विभाग (CCID) ने फिर से 100 सायबर सॉफ़्टवेयर टूल्स के प्रयोग को अनधिकृत घोषित किया, परन्तु इन टूल्स की निगरानी के लिये आवश्यक टैक्स्ट डेटा एक्सेस को राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत नहीं किया गया है। इस अधूरी नियामक व्यवस्था के कारण कई ठेकेदार और स्टार्ट‑अप्स को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है, जिससे सार्वजनिक‑निजी भागीदारी (PPP) मॉडल में भी गिरावट आ रही है।
साइबर फ़ॉरेंसिक में परामर्शी संस्थानों की ओर से लगातार यह संकेत मिलता रहा है कि पुलिस को समय पर डिजिटल सबूत सुरक्षित करने में अक्सर देरी होती है, जिससे साक्ष्य के अप्रमाणिक होने का जोखिम बढ़ जाता है। इस सतत समस्या को सुलझाने के लिए, कई विशेषज्ञों ने केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) से मांग की है कि वह राज्य‑स्तर पर “डिजिटल फॉरेंसिक इकाई” स्थापित करे, जिसमें प्रमाणित सॉफ़्टवेयर और अनुभवी विश्लेषक हों।
नीति‑निर्माताओं और प्रशासन के बीच जिम्मेदारी का अंतराल स्पष्ट है। जबकि सरकार ने “डिजिटल इंडिया” को सशक्त बनाने के लिये 1,00,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है, उसी समय साइबर अपराध प्रतिबंध करने के लिये वैधानिक साधनों का वहन ग्राहकों पर ही गिरा दिया गया है। उपभोक्ता मामलों में पुनर्भुगतान, मनी‑लॉन्डरिंग रोकथाम और सख्त सायबर‑सुरक्षा मानकों की अनुपस्थिति ने नागरिक‑विश्वास को कमज़ोर कर दिया है।
सिविल सोसाइटी संगठनों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि मौजूदा “डिजिटल अधिकार” अधिनियम में कानूनी सहारा नहीं है, जिससे पीड़ितों को न्याय पाने में लंबी खींचतान का सामना करना पड़ता है। उन्होंने “साइबर पीड़ित सहायता केंद्र” के सृजन की मांग की है, जिसमें मानसीक सलाह, कानूनी सहायता और आर्थिक पुनर्स्थापनात्मक उपाय उपलब्ध हों।
सारांशतः, साइबर अपराध में 18 प्रतिशत की इजाफ़ा और धोखाधड़ी के प्रमुख कारण के रूप में उभरने से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल तकनीकों का दुरुपयोग रोकने हेतु मौजूदा प्रशासनिक ढांचा अपूर्ण है। नीति पुनरुद्दयन, राज्य‑स्तर की तकनीकी क्षमताओं का बुनियादी विकास, नियामक औजारों की मानकीकरण, तथा पीड़ितों के लिए सार्थक पुनर्स्थापनात्मक उपायों के बिना इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करना कठिन रहेगा। स्पष्ट है कि सरकार को तुरंत ‘जवाबदेह साइबर शासन’ की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, varna डिजिटल अर्थव्यवस्था की उन्नति के साथ‑साथ नागरिकों के विश्वास का क्षरण आगे बढ़ेगा।
Published: May 7, 2026