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शशि थरूर ने एआई‑निर्मित दीपफ़ेक से सुरक्षा के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की याचिका
दिल्ली, 9 मई 2026 – कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने दिल्ली उच्च न्यायालय में आवेदन किया कि उन पर बनायीं गई एआई‑आधारित दीपफ़ेक वीडियो को प्रतिबंधित किया जाए। इन झूठी क्लिपों में उन्हें पाकिस्तान की प्रशंसा करते तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अनुत्तरदायी राय देते दिखाया गया है। थरूर ने तर्क दिया कि ऐसे हेरफ़ेर किए गये दृश्य न केवल भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को धूमिल करेंगे, बल्कि विदेशी सत्ता‑प्रयोग का साधन बन सकते हैं।
यह मामला डिजिटल युग की तेज़ी से बदलती चुनौतियों और भारत के मौजूदा नियमनात्मक ढाँचे के बीच मौजूद अंतर को उजागर करता है। वर्तमान में एआई‑निर्मित सामग्री के प्रसार को रोकने के लिये कोई विशेष विधायी प्रावधान नहीं है; सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के पास केवल सामान्य डेटा‑सुरक्षा और साइबर‑क्राइम अधिनियम के धागे बिखरे हुए हैं। इस गंभीर असंगतता को थरूर की याचिका ने प्रशासनिक रुझानों की जड़ता पर सवाल उठाते हुए सामने लाया है।
सरकारी पक्ष ने अभी तक आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है, परन्तु कई नीति‑निर्माताओं के बीच यह मान्य है कि जाँच‑पड़ताल के लिये मौजूदा न्यायिक प्रक्रम पर्याप्त नहीं है। हाई कोर्ट को अब यह तय करना पड़ेगा कि मौजूदा कानूनों के तहत एआई‑निर्मित सामग्री को बैन किया जा सकता है, या विशेष विधेयक की आवश्यकता है। अदालत की इस दिशा‑निर्देशित कार्रवाई का इंतज़ार अब न सिर्फ थरूर, बल्कि सभी राजनैतिक और सामाजिक वर्गों को है, जो इस नई तकनीकी खतरे से अपनी आवाज़ बचाना चाहते हैं।
सार्वजनिक उत्तरदायित्व की बात करें तो यह स्पष्ट है कि तकनीकी निगरानी में संस्थागत सुस्ती न सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को धीमा करती है, बल्कि नागरिकों के भरोसे को भी क्षीण करती है। जब संसद के सदस्य को अपनी छवि बचाने हेतु न्यायालय का सहारा लेना पड़े, तो यह सवाल उठता है कि क्या सरकार अपने ही डिजिटल नीति‑निर्माण में पर्याप्त तत्परता दिखा रही है। इस याचिका के माध्यम से थरूर ने न सिर्फ व्यक्तिगत सुरक्षा की मांग की, बल्कि एक व्यापक नीति‑परिवर्तन की माँग भी रखी है – एक ऐसा ढाँचा जो एआई‑भ्रष्ट सामग्री को तुरंत पहचान कर रोक सके, और उल्लंघन करने वालों पर सख़्त प्रतिबंध लगा सके।
अंततः, यह पहल यह संकेत देती है कि भारत में एआई‑दीपफ़ेक के ख़र्चे पर सार्वजनिक विमर्श और नियामक कार्रवाई की गति धुंधली रह सकती है, जब तक कि संवैधानिक निकाय और विधायी मंच इस नई तकनीकी चुनौती को त्वरित एवं संगठित रूप से नहीं अपनाते।
Published: May 9, 2026