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Category: भारत

वरिष्ठ वकील तुषार मेहता ने पुस्तक में न्यायिक ‘बुली’ के प्रयोग की की कड़ी आलोचना

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष तुषार मेहता ने अपनी आगामी पुस्तक में न्यायालय में कुछ न्यायाधीशों के ‘जज बली’ (judicial bullying) के व्यवहार को खुली चुप्पी के रूप में उजागर किया है। लेखक के अनुसार, कोर्टरूम में अनावश्यक श्रद्धा और सन्मान की पृष्ठभूमि में कई जजों ने अधिवक्ताओं और पक्षकारों के प्रति आक्रामक रुख अपनाया, जिससे न्यायप्रक्रिया की गंभीर बाधाएँ उत्पन्न हुईं।

मेहता ने यह तर्क दिया कि न्यायाधीश अत्यधिक दबावों के सामना करते हैं, परंतु यह दबाव उन्हें अनादर या अभद्रता के योग्य नहीं ठहराता। भारतीय लोकतंत्र में न्यायसंस्था को हटाना या बदलना आसान नहीं है, इसलिए जनता की अपेक्षा उच्च नैतिक मानकों की है। इस संदर्भ में, न्यायिक संस्थान के भीतर मौजूदा जवाबदेही तंत्र की अपर्याप्तता को उन्होंने प्रमुख समस्या के रूप में पेश किया।

वर्तमान में भारत में न्यायिक आचरण के नियमन को ‘जजेज़ एथिक्स कोड’ और ‘जजेज़ कॉम्प्लेन्ट फॉर्म’ जैसे उपायों से नियंत्रित किया जाता है, परन्तु इन मानकों की लागूता, निगरानी और दंडात्मक कार्रवाई में स्पष्ट कमी देखी गई है। अधिवक्ताओं के लिए न्यायालय में ‘शक्ति असंतुलन’ का अस्तित्व केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि प्रणालीगत दुर्बलता का संकेत देता है।

समीक्षा में यह भी उभरा कि साहसिक कदम उठाने वाले वकीलों को अक्सर अतिसंवेदनशील या “संसदीय पदधारी” के रूप में चित्रित किया जाता है, जिससे उनके पेशेवर सम्मान पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इस प्रकार की माहौल, जहाँ “सिंहासन की थकान” के नाम पर अभिजात्य अभिगमन को वैध ठहराया जाता है, प्रशासनिक लापरवाही और संस्थागत सुस्ती का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

नीति-निर्माताओं के लिए यह चेतावनी है कि केवल न्यायिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और कार्यात्मक संवेदनशीलता भी समान रूप से सुदृढ़ होनी चाहिए। अतः, न्यायिक अनुशासन बोर्ड को अधिकारशाली बनाना, शिकायतों की त्वरित सुनवाई के लिये स्वतंत्र सत्यापन यंत्र स्थापित करना और सार्वजनिक रिपोर्टिंग को अनिवार्य करना आवश्यक है। ऐसा न केवल वकीलों के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि न्यायपालिका के प्रति सार्वजनिक विश्वास को भी पुनः स्थापित करेगा।

मेहता की पुस्तक इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण दर्पण बन कर उभरी है—जिसमें न्यायालय के भीतर मौजूद शक्ति विषमताओं को उजागर कर, शासन के पुनरुज्जीवन की मांग की गई है। जब तक संस्थागत जवाबदेही के ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक ‘जज बली’ का दृष्टांत निरंतर न्याय प्रक्रिया को अंधेरे में धकेलता रहेगा।

Published: May 4, 2026