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Category: भारत

लेह‑कर्गिल में जलविद्युत संयुक्त उद्यम को लेकर सोनम वांगचुक और लादाख बौद्ध संघ की कड़ी निशानी

जून 2026 में लादाख के लेह‑कर्गिल क्षेत्रों में प्रस्तावित जलविद्युत संयुक्त उद्यम (ज्वाइंट वेंचर) पर राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर तीव्र विरोध उभर रहा है। इस परियोजना के मुख्य विरोधी वस्तु‑विवेक के प्रवर्तक, इंजीनियर‑शिक्षाविद सोनम वांगचुक और लादाख बौद्ध संघ (LAB) हैं, जिन्होंने अपनी सार्वजनिक स्थिरता और पर्यावरणीय चिंताओं को सामने रखा है।

सरकार ने इस उद्यम को उत्तराखंड‑लादाख के दूरस्थ क्षेत्रों को विश्वसनीय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने और स्थानीय आर्थिक विकास को तेज करने के साधन के रूप में प्रस्तुत किया है। योजना के तहत दो बड़े डैम और कई छोटे जलशक्ति स्टेशन स्थापित किए जाने थे, जिसकी कुल स्थापित क्षमता लगभग १,२०० मेगावाट बताई गई है। निजी निवेशकों के साथ साझेदारी में इस परियोजना को गति देने के नाते, प्रशासकीय निकायों ने पंजीकरण, पर्यावरणीय मंजूरी और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाएँ तेज़ी से आगे बढ़ाने का इरादा घोषित किया।

परंतु लादाख बौद्ध संघ ने त्वरित तथा व्यावहारिक कारणों से इस प्रक्रिया को अलोकप्रिय कहा। संघ के प्रतिनिधि दावेदारी करते हैं कि इस उद्यम से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र, बौद्ध मोनास्ट्री और शहरी बस्तियों के जल स्रोतों को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि परियोजना की तैयारियों में स्थानीय समुदायों की सहमति और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (एसआईए) को नजरअंदाज किया गया है, जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता में आई खामियों की गंभीरता स्पष्ट होती है।

सोनम वांगचुक ने सार्वजनिक मंच पर कहा, “उच्च तकनीक‑जुड़ी ऊर्जा योजनाओं के लिए लादाख की भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि नीति‑निर्माता स्थानीय स्तर पर जुड़ी भागीदारी के बिना बड़े निवेशकों को प्राथमिकता देंगे, तो यह विकास की भ्रामिका बन जाएगी।” उन्होंने इस बात को दोहराते हुए संकेत दिया कि लादाख में जल संसाधनों के नियमन में राज्य और केंद्र सरकार की असंगत नीतियों ने पहले भी कई अल्पकालिक परियोजनाओं को विफल कर दिया है।

इन आपत्तियों के बावजूद, क्षेत्रीय प्रशासन ने अपना समर्थन नहीं घटाया। लद्दाख प्रशासनिक विभाग के अधिसूचक ने कहा, “हमारी प्राथमिकता ऊर्जा असुरक्षा को दूर करना है, और यह योजना उस दिशा में एक कदम है। सभी नियामकीय उपाय लागू किए जा रहे हैं और बाधाओं को न्यूनतम किया जाएगा।” इस बयान के साथ ही, प्रशासन ने सार्वजनिक सुनवाई के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल स्थापित किया, परन्तु मौजूदा डिजिटल पहुंच की सीमाओं के कारण कई ग्रामीण समुदायों के लिए यह माध्यम व्यर्थ रहा।

विरोधी संगठनों का मानना है कि यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही, नीति‑निर्माण की लापरवाही और संस्थागत सुस्ती का प्रतीक बनता जा रहा है। लदाख के कठोर शिल्पीय परिदृश्य में जलविद्युत परियोजनाओं की पूर्व प्रक्रिया में पर्यावरणीय प्रतिबंधों की अनदेखी, स्थानीय संसाधन प्रबंधन में असंगतता और सार्वजनिक सहभागिता के अभाव ने न केवल विकास के दीर्घकालिक प्रभाव को अस्पष्ट किया है, बल्कि प्रशासन के सार्वजनिक भरोसे को भी क्षीण किया है।

वर्तमान में, विरोध विरोधी समूहों ने न्यायिक चुनौती देने की तैयारी कर ली है और आगामी सार्वजनिक सुनवाई को भरी भागीदारी के साथ आयोजित करने की मांग की है। यदि इस संघर्ष को समय पर हल नहीं किया गया, तो लादाख के जल संसाधनों की नाजुकता, स्थानीय संस्कृति और राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के बीच मौजूदा असंतुलन को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे प्रशासनिक विफलता के प्रमाण और स्पष्ट हो जाएंगे।

Published: May 5, 2026