जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

लू. जनरल एन.एस. राजसुब्रमणि को अगला मुख्य रक्षा अधिकारी नियुक्त, वी.ऐड. कृष्ण स्वामीनाथन को नौसेना प्रमुख

नई दिल्ली (११ मई २०२६) – रक्षा मंत्रालय ने आज के एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में लू. जनरल एन.एस. राजसुब्रमणि को मुख्य रक्षा अधिकारी (सीडीएस) के रूप में और वी.ऐड. कृष्ण स्वामीनाथन को भारतीय नौसेना के नौसैनिक कमांडर‑इन‑चीफ़ (सीएन) के रूप में नियुक्त किया। दोनों नियुक्तियों का औपचारिक आदेश राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद जारी किया गया, जिससे सरकार ने सशस्त्र बलों के उच्चतम स्तरीय नेतृत्व में बदलाव की घोषणा की।

सीडीएस का पद, जो २०२० में स्थापित हुआ, भारतीय सैन्य संरचना में तीन सशस्त्र शाखाओं – सेना, वायुसेना और नौसेना – के बीच सामरिक समन्वय को सुदृढ़ करने के लिए है। पिछले दो सीडीएसों के कार्यकाल में कई बार यह आलोचना हुई थी कि रणनीतिक योजना और बजट आवंटन में दोहराव और विभागीय टकराव बना रहा। अब राजसुब्रमणि की नियुक्ति इस संदर्भ में एक नए सिरे से संतुलन स्थापित करने की आशा जताती है, परन्तु चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी ने फिर से प्रश्न उठाया है।

विपक्षी दल और रणनीतिक विशेषज्ञों ने यह तर्क दिया है कि सीडीएस की नियुक्ति में केवल सैन्य सेवा के वरिष्ठ अधिकारी को प्राथमिकता देना, अंतर‑सेवा सहयोग को जनजातीय रूप से नहीं बल्कि पदानुक्रमिक रूप से प्रतिबंधित कर देता है। सरकारी पक्ष ने जवाब में कहा कि चयन समिति ने चार‑सदस्यीय पैनल के माध्यम से मानदंडों के आधार पर राजसुब्रमणि को सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार घोषित किया, परन्तु पैनल के सदस्य, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया और मूल्यांकन मानदंड सार्वजनिक नहीं किए गए। यह घास‑फूस के समान है – सभी देख सकते हैं, पर वास्तविक आकृति अस्पष्ट ही रहती है।

नौसेना के नए प्रमुख, वी.ऐड. कृष्ण स्वामीनाथन, को एक कठिन शिपयार्ड पुनरुद्धार और मानव संसाधन मर्यादा के बीमारियों से जूझते हुए देखा गया है। भारतीय नौसेना पिछले कुछ वर्षों में उन्नत पनडुब्बी और विमानवाहक पोतों की देरी के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये चिंताजनक स्थिति में रही है। स्वामीनाथन के पास जेयरिक अनुभाव है, परन्तु उन्हें साकार करने के लिये आवश्यक बजटीय समर्थन और शिल्पकारी नीति में तेज़ी लाना अभी भी सरकारी अधीरता पर निर्भर है।

इन दो नियुक्तियों का समय सरकारी वर्ष के अंत में, जब संसदीय विपक्षीय प्रश्नावली सत्र निकट है, विशेष रूप से रोचक है। यह संकेत देता है कि सत्ता पक्ष अपनी सुरक्षा नीति को पुनः प्रकट कर ‘रॉकेट विज्ञान’ की चमक के साथ जनता को आकर्षित करना चाहता है, जबकि वास्तविक कार्य‑क्षमता के लिये संस्थागत अक्षमता को दूर करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

रक्षा विभाग के भीतर अक्सर ‘इंडियन रिव्यू ऑफ़ मिलिटरी अफेयर्स’ में रिपोर्ट किया गया है कि निर्णय‑लेने की प्रक्रिया में कई स्तरों की अनुमोदन‑सत्र की आवश्यकता होने से समयसीमा में अनावश्यक विलंब होता है। इस विफलता को ‘सांस्थिक सुस्ती’ कहा जा सकता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के खर्चे को बढ़ावा देता है और कर‑दाताओं के धनों को व्यर्थ बर्वाद बनाता है।

समग्र रूप से, राजसुब्रमणि को सीडीएस और स्वामीनाथन को नौसेना प्रमुख बनाकर सरकार ने एक प्रतीकात्मक बदलाव किया है, परन्तु वास्तविक नीतिगत सुधार, बजट आवंटन की पुर्नविचार, और अंतर‑सेवा सहयोगी ढांचे की कार्यान्वयन की आवश्यकता अभी भी टिका हुआ है। जब तक ये संस्थागत मुद्दे हल नहीं होते, तब तक इन शीर्षकों की चमक केवल कागज़ पर ही रह जाएगी।

Published: May 9, 2026