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रिलायंस के जुड़े अधिकारी को DGCA भ्रष्टाचार मामले में जमानत मिली

नई दिल्ली – सिविल एविएशन नियामक DGCA के साथ जुड़े एक भ्रष्टाचार मामले में भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के पूर्व सहायक को जमानत प्रदान कर दी। अभियोजन पक्ष ने कहा था कि आरोपित अधिकारी ने विमानन लाइसेंसिंग प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से रिश्वत का भुगतान किया था, जबकि बचाव पक्ष ने इस आरोप को ‘रूढ़िवादी’ और ‘प्राविधिक त्रुटि’ के रूप में खारिज किया।

यह मामला 2024 में शुरू हुआ था, जब वित्तीय जांच एजेंसी (FIU) ने कई लेन‑देनों की जांच की और DGCA के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई संदिग्ध भुगतान का पता लगाया। उन लेन‑देनों में वही नाम उभरा था जो RIL की कई सहायक कंपनियों से जुड़े थे। तब से मामले में कई चरणों में सुनवाई चलती रही, जिसमें कुछ सरकारी अधिकारियों की प्रत्यक्ष भागीदारी और अनुमति भी शामिल थी।

जमानत के आदेश में न्यायालय ने कहा है कि बंधक जमा करने के बाद आरोपी को 60 दिनों की भीतर पुलिस को सभी आवश्यक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने होंगे। साथ ही, न्यायालय ने “उच्च जोखिम” को देखते हुए, आरोपी को अंतर्राष्ट्रीय यात्रा प्रतिबंध के तहत रखा है।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया के ताने‑बाने में यह स्पष्ट हो रहा है कि नियामक संस्थाओं और बड़े उद्योग समूहों के बीच पारदर्शिता की कमी अस्थायी रूप से सच्चे उत्तरदायित्व को बाधित कर रही है। DGCA ने इस निर्णय पर “क़ानूनी प्रक्रिया के प्रति पूर्ण सम्मान” व्यक्त किया, परन्तु उन्होंने यह भी जोड़ा कि “पर्याप्त सबूत न मिलने पर कार्रवाई रोकना भी न्यायिक प्रणाली की बुनियाद है”। यह बयान, जबकि औपचारिक है, उन कई प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ देता है जिनके उत्तर नागरिक समाज ने पहले ही मांगे थे – जैसे कि किस हद तक नियामक निकायों को उद्योग के दबाव से मुक्त किया गया है, और क्या मौजूदा भ्रष्टाचार विरोधी ढाँचे में सुधार की कोई ठोस योजना है।

नीति‑निर्माण के पहलू से देखें तो, इस मामले ने एक बार फिर ‘पुस्तक‑के‑कागज़ों के नियम’ और ‘व्यावहारिक अनुप्रयोग की खामियां’ को उजागर किया है। 2022 में DGDG (डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ सिविल एविएशन) ने ‘रिश्वत‑मुक्त विमानन नीति’ की घोषणा की थी, परन्तु उस नीति के कार्यान्वयन में आवश्यक सुदृढ़ निरीक्षण तंत्र, स्वतंत्र आंतरिक लेखा परीक्षा, तथा सख़्त दण्ड प्रावधान नज़र नहीं आए। इस प्रावधान के अभाव में, बड़े कॉर्पोरेट समूहों को नियामक प्रक्रियाओं के साथ ‘आंतरिक समझौते’ करने की सुविधा मिल रही है, जो सार्वजनिक भरोसे को धीरे‑धीरे कमज़ोर करती है।

समूहों के बीच ‘संस्थागत सुस्ती’ के साथ ही, ‘जवाबदेही’ की कमी भी साफ़ तौर पर दिख रही है। 2023 में वित्त मंत्रालय ने ‘विमानन क्षेत्र में भ्रष्टाचार निरोधक समिति’ की स्थापना का प्रस्ताव रखा, परन्तु उस समिति की कार्यवाही अभी तक पारगमनशील नहीं हो पाई है। इस स्थिति में, न्यायालय का जमानत‑निर्णय, यद्यपि कानूनी रूप से वैध है, लेकिन यह वैचारिक रूप से यह संकेत देता है कि कई उच्च‑स्तरीय मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई का दायरा सीमित है।

इस विकास की प्रतिक्रिया में नागरिक परिवहन संघ (CTA) ने कहा कि “यदि नियामकों के भीतर आस्तिकता के साथ-साथ ‘निष्पक्षता’ की गारंटी नहीं लगाई गई, तो विमानन सुरक्षा और सार्वजनिक हित दोनों जोखिम में पड़ेगा।” उन्होंने एक साथ दो प्रमुख मांगें भी रखी‑; पहला, स्वतंत्र विशेष जांच आयुक्त की नियुक्ति, और दूसरा, भ्रष्टाचार‑रहित नीति‑निर्धारण के लिए वैधानिक संशोधन।

संक्षेप में, इस जमानत से सामने दो सतही‑सही परतें उजागर होती हैं: एक तो यह कि न्यायिक प्रक्रिया ने ‘प्रूफ‑ऑफ़‑बर्डन’ सिद्धांत को कायम रखा, और दूसरी यह कि ‘नियामक‑औद्योगिक सहयोग’ की गहराई में बसी अस्थिरता को अब और छुपाया नहीं जा सकता। अब यह देखना होगा कि प्रशासनिक संस्थाएँ इस तथ्य को किस हद तक गंभीरता से लेती हैं, और क्या इस मामले से नीति‑परिवर्तन की दिशा में वास्तविक सुधार निकल पाते हैं, अथवा ‘कागज़ी वादे’ ही बनी रहें।

Published: May 5, 2026