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राज्यसभा मतों में क्रॉस‑वोटिंग पर NC‑PDP में विवाद, भाजपा को मिली संभावित सहारा
नई दिल्ली, 6 मई 2026 – इस महीने के अंतिम सप्ताह में हुए राज्यसभा चुनाव में कई सीटों पर मतों की गिनती के बाद राष्ट्रीय कांग्रेस (NC) तथा पीडिपी (PDP) के बीच तीखा टकराव उभरा। दोनों दलों ने एक-दूसरे पर यह आरोप लगाया कि वे अपने मूल मतदाताओं के विरुद्ध क्रॉस‑वोटिंग कर रहे हैं, जिससे केंद्र सरकार के प्रमुख दल, भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कई सीटों में अनपेक्षित समर्थन मिल रहा है।
पारदर्शी प्रक्रिया की अपेक्षा रखते हुए, चुनाव आयोग ने पहले ही इस आरोपों को गंभीरता से लेते हुए चयनात्मक जाँच की घोषणा की। हालांकि, आधिकारिक अभिलेखों में अभी तक कोई ठोस निष्कर्ष नहीं आया है, जिससे प्रशासनिक जाँच की गति को लेकर आलोचकों ने ‘संस्थागत सुस्ती’ की तालियों की गड़गड़ाहट की है।
NC के प्रवक्ता ने कहा, “हमारे पार्टी के कुछ सदस्य ने वैध विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन देने का इरादा नहीं रखा। यह एक अनैतिक क्रॉस‑वोटिंग का मामला है, जो बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांतों की उपेक्षा करता है।” वहीं PDP के नेता ने तुरंत उत्तर दिया, “यह बस राजनीतिक चालबाज़ी है; हमारे कई प्रतिनिधियों ने व्यक्तिगत हितों के कारण स्वतंत्र रूप से मतदान किया है, न कि किसी दल के दबाव में।”
भाजपा के प्रतिनिधियों ने इस कथा को बड़े पैमाने पर अपनाते हुए कहा कि “यह दलों के बीच की आंतरिक असहमति ही भाजपा को विविध मतधाराओं से समर्थन प्राप्त करने का अवसर देती है।” इस बयान ने विपक्षी दलों को एक और सवाल के घेरे में ला दिया – क्या सत्ता में रहने वाला दल सार्वजनिक समर्थन को मनचाहे तौर पर प्राप्त करने के लिए प्रतिद्वंद्वियों के बीच दरारें उत्पन्न कर रहा है?
राज्यसभा की इस अंशकालिक लड़ाई में प्रशासनिक प्रतिक्रिया का स्तर भी प्रश्न उठाता है। चुनाव आयोग ने “विकसित प्रक्रियात्मक उपाय” का उल्लेख किया, परन्तु अकड़ में अटकी नौकरशाही ने तुरंत कार्रवाई में कर दिखाने का साहस नहीं किया। इससे यह तर्क उभरता है कि लोकतांत्रिक संस्थानों की कार्यकुशलता केवल कागज़ी प्रक्रिया तक सीमित नहीं, बल्कि समय पर उत्तरदायित्व और निष्पक्ष जाँच पर भी निर्भर करती है।
वर्तमान परिदृश्य में, यदि क्रॉस‑वोटिंग की पुष्टि हो भी जाती है, तो यह न केवल BJP को अतिरिक्त सीटें दिला सकता है, बल्कि भविष्य में समान चुनौतियों से निपटने के लिए चुनावी नियमों की सख्त पुनरावृत्ति की आवश्यकता भी उजागर करेगा। नीति निर्माताओं को यह जरूरी है कि वे न केवल तकनीकी सुधार, बल्कि राजनीतिक नैतिकता के पुनर्निर्माण में भी निवेश करें।
सारांशतः, इस विवाद ने भारतीय लोकतंत्र की दो कमजोरियों को उजागर किया – एक तो राजनीतिक दलों के भीतर अनुशासन की कमी, और दूसरा सार्वजनिक संस्थानों की धीमी प्रतिक्रिया। नागरिकों को इस मुद्दे पर सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि केवल सुदृढ़ निगरानी ही सत्ता के दुरुपयोग को सीमित कर सकती है और जवाबदेही को सुनिश्चित कर सकती है।
Published: May 7, 2026