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Category: भारत

ममता बनर्जी ने टीएमसी काउंटी एजेंटों को धूप के बाद जीत का भरोसा, ईसी पर आरोपों के बीच

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के परिणाम गिनने के अंतिम चरण में, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने औपचारिक उम्मीदवारों और गिनती के एजेंटों को ‘काउंटी सेंटर’ में नहीं निकलने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा, “सूरज डूबने के बाद जीत हमारे पक्ष में होगी, किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है,” और साथ ही चुनाव आयोग (ईसी) पर “कदाचित् अनुचित कार्यवाही” का आरोप भी लगाया।

बनर्जी, जो अपने चौथे निरंतर कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ रही हैं, का यह बयान कई स्तरों पर प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है। जल्द‑बाज़ी में गिनती प्रक्रिया को चलाने, सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से ईसी की है, परंतु यह बयान संकेत देता है कि पार्टी के भीतर डर और अनिश्चितता का माहौल रहा—जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

ऐसे संदर्भ में, यह देखना आवश्यक है कि क्या चुनाव आयोग ने पर्याप्त ढाँचा तैयार किया है जिससे सभी दलों को समान और निष्पक्ष व्यवस्था मिल सके। अक्सर प्रमुख राज्यों में गिनती केंद्रों पर पुलिस की तैनाती, इलेक्ट्रॉनिक ब्रोडकास्टिंग उपकरणों की कार्यक्षमता तथा रियल‑टाइम परिणामों की उपलब्धता जैसे बुनियादी पहलुओं में चूकों के कारण देर‑से‑देर उभरते हुए आरोप सामने आते रहे हैं। यह संस्थागत सुस्ती न केवल राजनीतिक दलों के बीच प्रतिद्वंद्विता को प्रज्वलित करती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी क्षीण करती है।

बनर्जी द्वारा “बीजेपी की योजना है कि पहले वे खुद को आगे दिखाएँ” जैसी टिप्पणी को देख कर यह स्पष्ट होता है कि चुनावी जीत को व्यक्तिगत राजनीति के इर्द‑गिर्द घुमाना, नीति‑निर्माण की ओर से गंभीर विचार‑विमर्श को नज़रअंदाज़ कर देता है। ऐसी शब्दबद्ध रणनीति, जहाँ दूसरे दल की ‘पहले दिखने’ की बात को निंद्य बनाया जाता है, अक्सर सत्ता‑संकल्पनात्मक ढाँचे को कमजोर करती है और लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा को पृष्ठभूषण बनाकर रख देती है।

व्यवस्थित रूप से, इस स्थिति में प्रशासनिक तंत्र को दो प्रमुख दिशा‑निर्देशों की आवश्यकता है: प्रथम, गिनती केंद्रों में सुरक्षा एवं तकनीकी समर्थन को विश्वसनीय मानकों के अनुरूप बनाना, और द्वितीय, चुनाव परिणामों की सार्वजनिक उपलब्धता को वास्तविक‑समय में सुनिश्चित करना। अथवा नहीं तो, “सूरज डूबते‑डूबते जीत” जैसी आशावादिता केवल चुनावी संचार का हिस्सा बनकर रह जाएगी, जो अंततः चुनाव आयोग की जवाबदेही को प्रश्नांकित करेगी।

सारांश में, ममता बनर्जी का यह बयान, जबकि राजनीतिक दृढ़ता का प्रतीक हो सकता है, लेकिन साथ ही प्रशासनिक लापरवाही, नियामक संस्थानों की अक्षमता और नीति‑निर्माण में पारदर्शिता की कमी को भी उजागर करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्वस्थ कार्यन्वयन के लिए केवल शब्दों से अधिक, ठोस संस्थागत सुधारों की जरूरत है, ताकि मतदाताओं को सच्ची सुरक्षा और निष्पक्षता का भरोसा मिल सके।

Published: May 4, 2026