भारत‑म्यांमार नौसेना बैठक: सुरक्षा सहयोग में गति की आवश्यकता
नई दिल्ली के बाहरी मामलों के विभाग ने रविवार को जारी किए एक प्रेरक बयान के बाद, भारतीय नौसेना प्रमुख ने म्यांमार के नौसेना नेतृत्व से निकल्लेब्बी (Naypyidaw) में मुलाक़ात की। इस दो‑दिवसीय संवाद का मुख्य उद्देश्य बंगाल की खाड़ी के समुद्री सुरक्षा फ्रेमवर्क को सुदृढ़ बनाना और रक्षा सम्बंधों में नई किनारी जोड़ना रहा।
बैठक में भारतीय नौसेना के प्रमुख, उपाध्याक्षी (उपनाम) महापौर, तथा म्यांमार नौसेना के प्रमुख, जनरल अजीजिन कोत्रे के बीच संयुक्त रणनीतिक योजना पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने पहले से हस्ताक्षरित 2022 के सुरक्षा सहयोग समझौते को दोहराते हुए, संयुक्त समुद्री अभ्यास, सूचना‑साझाकरण नेटवर्क, तथा सीमांत निगरानी के लिए द्विपक्षीय शिप‑टू‑शिप कार्यक्रमों की मांग की।
विचार-विमर्श के दौरान कुछ प्रमुख बिंदु उभरे: 1) सिट्टवे (Sittwe) बंदरगाह में भारतीय रडार और निगरानी सुविधा की त्वरित स्थापना, 2) म्यांमार के तटीय सुरक्षा दलों को आधुनिकीकरण हेतु भारत‑निर्मित बहु‑उद्देशीय जहाजों की आपूर्ति, तथा 3) समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना और व्यक्ति तस्करी को रोकने हेतु सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम। इन बिंदुओं को शब्दावली में “त्वरित कार्यान्वयन” कहा गया, पर वास्तविकता में यह किस हद तक जल्दी होगा, सवाल अभी बना हुआ है।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो, पिछले चार वर्षों में भारत‑म्यांमार के बीच कई समझौतों के कागज पर हस्ताक्षर हुए, पर फील्ड में उनका प्रभाव अक्सर रेत के किले जैसा टूटा‑फूटा रहा। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि “नीति‑निर्देश स्पष्ट हैं”, पर बजट आवंटन, कस्टम्स मंजूरी और द्विपक्षीय प्रोटोकॉल की जटिलता ने कार्य‑प्रवर्तन को धीमा कर दिया है। इसी अभिरुचि के साथ, संसद के औद्योगिक सुरक्षा समिति ने भी कई बार इस पर प्रश्न उठाए हैं, लेकिन उत्तर में अक्सर “प्रशासनिक लचीलापन” के शब्दों का प्रयोग किया गया, जिससे संस्थागत सुस्ती का आरोप स्पष्ट होता है।
भौगोलिक संदर्भ नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। बंगाल की खाड़ी में चीन की “एक रास्ता‑एक बंदरगाह” पहल, साथ ही इंडो‑पैसिफिक गठजोड़ और भारत‑अमेरिका के समुद्री सहयोग के बढ़ते कदम, इस क्षेत्र को जटिल रणनीतिक धुरी बनाते हैं। इस प्रतिद्वंद्विता के मध्य, भारत‑म्यांमार के सहयोग को केवल कागज पर नहीं, बल्कि ठोस कार्य‑पदों के माध्यम से सिद्ध करना आवश्यक है, अन्यथा “सुरक्षा सहयोग” का शब्द व्याख्यान‑केवल बन कर रह जायेगा।
सारतः, साथ ही साथ नीति‑निर्माण और उसके निष्पादन में समान गति लाना, प्रशासनिक अड़चनें दूर करना और सार्वजनिक जवाबदेही को सुदृढ़ करना ही इस दो‑पक्षीय पहल को प्रभावी बनाने की जरूरत है। तभी बंगाल की खाड़ी में समुद्री सुरक्षा का वादा केवल भाषण नहीं, बल्कि वास्तविक तट‑से‑तट सुरक्षा में बदल सकेगा।
Published: May 6, 2026