जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

भाजपा की उप‑राष्ट्रपति खुषबू सुंदर ने टीडीवी के प्रमुख विजय को मुख्यमंत्री पद की सिफारिश की

तमिलनाडु में 2026 के राज्य चुनावों की कड़ी गिनती शुरू हो चुकी है, और इस बीच भाजपा के राज्य उप‑प्रभारी खुषबू सुंदर ने सार्वजनिक रूप से टीडीवी (डेसिया मूर्फ़ोकु द्रविड़ कज़ग) के प्रबंधकीय अध्यक्ष विजय (विजयाकांत) को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में समर्थन दिया। यह घोषणा न केवल गठबंधन की रणनीतिक दिशा को स्पष्ट करती है, बल्कि राज्य‑स्तर पर प्रशासनिक प्रेरणा और नीतिगत निरंतरता के प्रश्न भी उठा देती है।

विजय, जिन्होंने दशकों से फिल्म‑समीक्षा के साथ‑साथ क्षेत्रीय राजनीति में भी अपना प्रभाव बनाए रखा है, अब अपने दल को एक संभावित प्रमुख भूमिका में देखना चाहते हैं। खुषबू सुंदर ने कहा, “वह सबसे उपयुक्त उम्मीदवार है, जो तमिलनाडु को नई दिशा देने में सक्षम है” – यह टिप्पणी न केवल व्यक्तिगत प्रशंसा है, बल्कि भाजपा के भीतर गठबंधन‑परक राजनैतिक रुख का प्रतिबिम्ब भी है।

भाजपा, जो पिछले दो चुनाव चक्रों में राज्य में सीमित संख्यात्मक शक्ति रखती रही, अब टीडीवी जैसे छोटे‑बड़े दलों को सहारा बनाकर सत्ता में पहुँचने का प्रयोग कर रही है। इस रणनीति के पीछे प्रशासनिक अडचणों से बचने की प्रवृत्ति निरंतर देखी जाती है: जब मौजूदा सरकारी ढांचे में घर्षण और नीतिगत अडचनें हों, तो नई गठबंधन‑संगतियों के माध्यम से “बदलाव” का आभास दिलाना आसान हो जाता है।

परंतु इस प्रकार की गठबंधन‑बाजियां दो‑तीन प्रश्न उठाती हैं। प्रथम, क्या किसी दल के नेता को केवल राजनीतिक समीकरणों के आधार पर मुख्यमंत्री का दावा करने दिया जाएगा, जबकि उनके पास प्रशासनिक कार्यान्वयन या सार्वजनिक सेवाओं में ठोस अनुभव नहीं है? द्वितीय, क्या इस प्रकार का समर्थन सत्ता‑परिवर्तन को वास्तविक पॉलिसी‑रिप्रेज़ेंटेशन से अधिक राजनैतिक खेल बना देगा? इन प्रश्नों की जड़ में राज्य‑स्तर की संस्थागत सुस्ती और जवाबदेही की कमी निहित है, जो अक्सर नीति‑निर्माण में गहरा प्रभाव डालती है।

साथ ही, केंद्र सरकार की तमिलनाडु‑विशिष्ट योजनाओं की कार्यान्वयन गति को देखते हुए, यह स्पष्ट हो रहा है कि एक नई सरकार को न केवल चुनावी वादों को पूरा करना होगा, बल्कि मौजूदा प्रशासनिक अवरोधों को भी दूर करना होगा। यदि गठबंधन‑आधारित सरकार अपना कार्यकाल जल्दी‑जल्दी समाप्त कर दे, तो केंद्र‑राज्य संबंधों में नया तनाव उत्पन्न हो सकता है, जिससे नागरिकों को मूलभूत सेवाओं में और अधिक व्यवधान का सामना करना पड़ सकता है।

खुषबू सुंदर के इस समर्थन को एक धोखाधड़ी‑समान राजनैतिक चालीस के रूप में भी देखा जा सकता है, जहाँ सत्ता के पुंज को विस्तृत करने के लिये छोटे‑बड़े दलों के नेता को “कैटालिस्ट” बना दिया जाता है। यह व्यावहारिक रूप से प्रशासनिक बुनियाद पर सवार होकर चलने की बजाय, राजनैतिक धुंध में निहित रहने का संकेत देता है।

अंत में कहा जा सकता है कि तमिलनाडु की राजनीति में यह कदम एक नई गठबंधन‑परक रणनीति को उजागर करता है, परंतु इससे प्रशासनिक जवाबदेही, नीति‑निर्माण की निरंतरता और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देने की आवश्यकता भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। घने राजनीतिक बायलेंस की परछाइयों में, यह देखना बाकी है कि यह समर्थन वास्तव में शासन‑योग्य योजना का भाग बन पाता है या सिर्फ चुनाव‑परिणाम को आकार देने वाला एक तात्कालिक उपाय बन कर रह जाता है।

Published: May 7, 2026