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Category: भारत

भोजन-धर्मिता में छुपी है राजनीति: बीजेपी के जीत उत्सवों पर प्रशासनिक प्रश्न

वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपना अग्रिम लाभ प्राप्त कर लिया, जिसे पार्टी के स्तर पर पारंपरिक बंगाली व्यंजनों—माछ‑करी, रसमालाई, रोशोगोला और झालमुरी—के रूप में जश्न में बदल दिया गया। यह अभिनव उत्सव शैली, जो बिहार और हरियाणा के पिछले चुनावों में लिट्टी‑चोखा और जलेबी के साथ देखी गई, भोजन को राजनीतिक मंच पर पुनः स्थापित करती है।

तथापि, जश्न की चमक के पीछे प्रशासनिक जाँच की आवश्यकता साफ़ है। कई नगर निकायों ने यह बताया कि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्थानों पर भोजन के प्रसार से कचरा प्रबंधन, सफ़ाई और ट्रैफ़िक व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, जबकि इनसे जुड़े खर्च अक्सर स्थानीय निकायों के बजट में अनपेक्षित रूप से जमा हो जाते हैं। नगरपालिका परिषदों ने कहा कि पूर्ववर्ती चुनावों में भी समान परिस्थितियों में खाने‑पीने के आयोजन के लिए विशेष अनुमति नहीं दी गई, और आज भी इस अनुशासनहीन नीति को वैध ठहराने के कोई स्पष्ट निर्देश नहीं हैं।

वहीं, चुनाव कोड ऑफ़ कॉन्डक्ट (EC) के तहत पार्टी खर्चों की सीमा निर्धारित है, परंतु बड़े पैमाने पर भोजन वितरण के खर्च को अक्सर “स्वैच्छिक दान” या “आधारभूत सांस्कृतिक कार्यक्रम” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यह वर्गीकरण न केवल सार्वजनिक धन के पारदर्शी उपयोग को धूमिल करता है, बल्कि चुनावी निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करता है। जब किसी पार्टी के समर्थक सार्वजनिक बजट या स्थानीय निगमों की सहायता से भोजन का प्रबंध करते हैं, तो यह असमान खेल का रूप ले सकता है।

स्थानीय प्रशासन भी इस अवसर पर सुरक्षा एवं स्वास्थ्य प्रोटोकॉल को लागू करने में झूटे कदम उठाता दिखता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के मानकों के अनुसार, बड़े आयोजन में खाद्य सामग्री की गुणवत्ता, तापमान नियंत्रण और हाइजीन मानकों की निगरानी अनिवार्य है। हालांकि, कई नगर निगमों ने यह बताया कि इन मानकों की अनुगमन के लिए जरूरी मानवीय संसाधन और तकनीकी उपकरणों की कमी है—एक ऐसी समस्या जो “संस्थागत सुस्ती” के नाम से जानी जाती है।

इस प्रकार, भोजन‑केंद्रित जीत जश्न केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक चुनौती का रूप लेता है। नीति‑निर्माताओं को इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि चुनावी माहौल में सार्वजनिक स्थानों पर बड़े स्तर पर खान‑पान कार्यक्रमों की अनुमति कैसे दी जाए, और यह सुनिश्चित किया जाए कि यह प्रक्रिया पारदर्शी, जिम्मेदार और नागरिकों पर वित्तीय बोझ न बढ़ाए।

भविष्य में, यदि ऐसे बड़े‑पैमाने के सामुदायिक आयोजनों को नियमन‑परक ढांचे के भीतर लाया जाए, तो न केवल कचरा प्रबंधन और स्वच्छता में सुधार होगा, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास भी सुदृढ़ होगा। वर्तमान में, यह प्रश्न बना रहता है—क्या राजनीतिक उत्सवों के पीछे छिपी आददीय “भोजन‑धर्मिता” को साधारण सांस्कृतिक मिलाप माना जाए, या इसे सार्वजनिक नीति के पुन: मूल्यांकन की ज़रूरत के रूप में देखा जाए।

Published: May 4, 2026