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Category: भारत

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में दो‑तीहाई बहुमत जीतकर त्रिणमूल सत्ता को ध्वस्त किया, मुख्यमंत्री चयन पर भार

पिछले दिवसीय विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने दो‑तीहाई बहुमत के साथ पश्चिम बंगाल में त्रिणमूल कांग्रेस के पंद्रह वर्षों के शासन को अन्तिम बार रोक दिया। प्रतिद्वंद्वी महात्मा बँधवी की अध्यक्षता वाली राज्य सरकार के प्रमुख पद से बहिष्कृत होने की घटनाओं के बाद यह परिणाम नीति‑निर्माण में लम्बे समय से चल रही विफलताओं का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।

बिहार‑उत्कृष्ट राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर केन्द्रित भाजपा का एंटी‑ट्रिनामूल अभियान, कई बार ‘बदलाव की जरूरत’ कहे जाने वाले सार्वजनिक कंट्रीब्यूशन को वास्तविक वोट‑से‑भोट में बदल दिया। परिणामस्वरूप, अब सरकार बनाना सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं रह गया; इसे अब नयी मुख्यमंत्री की पहचान तय करने की प्रक्रिया के रूप में देखना पड़ेगा। प्रमुख संभावनाओं में बागনपुर के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुवेन्दु आधिकारी, तथा पूर्व विधायक एवं राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय दिलीप घोष का नाम प्रमुख रूप से उभरा है।

राज्य के प्रशासनिक तंत्र पर यह बदलाव गहरा प्रभाव डालेगा। पिछले दशक में त्रिणमूल सरकार पर कई बार जलनिकासी, स्वास्थ्य सुविधाओं की असमानता और शहरी‑ग्रामीण विकास में असंतुलन के कारण आलोचना हुई थी। इन समस्याओं को ‘संस्थागत सुस्ती’ कहा जा रहा है, जिसके कारण योजनाओं का कार्यान्वयन अक्सर आगे‑पीछे रहता था। नया शासक वर्ग को इन बिंदुओं को तेज़ी से ठीक करने की माँग उठी है, परन्तु यह बात भी नहीं छुपी कि वही बर्बादी को रोकने के लिये बहु‑स्तरीय प्रशासनिक सुधार आवश्यक है, न कि केवल एक नई जनमुखी नीति।

बीजेपी के राजपरिषद की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से कोई नाम घोषित नहीं किया गया है, परन्तु सुवेन्दु आधिकारी को ‘विकास के वास्तुकार’ के रूप में सराहा गया है, जबकि दिलीप घोष को ‘सुरक्षा के संरक्षक’ कहा गया है। इन दोधारी प्रतिबद्धताओं के बीच नीति‑निर्माण के सन्दर्भ में संभावित टकराव की भी चर्चा हो रही है। यदि जलवायु परिवर्तन‑संबंधी आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य‑सेवा पहुँच और शहरी‑ग्रामीण बुनियादी ढाँचा अब तक के नीरस कार्यक्रमों से अलग दिशा में नहीं ले जाया गया, तो नई सरकार के दो‑तीहाई बहुमत का वास्तविक प्रभाव केवल ‘सिंट्रिक’ रह सकता है।

आधारभूत सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद प्रशासन कितना ‘जवाबदेह’ बनता है। पिछले वर्षों में कई शिकायतें उजागर हुई थीं कि जिला स्तर पर योजनाओं के लाभार्थियों का चयन अक्सर पक्षपातपूर्ण रहा, जिससे सामाजिक असंतुलन बढ़ा। नई सरकार के लिए प्रमुख चुनौती यह होगी कि वह इन प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाकर स्थानीय निकायों को सशक्त करे, नहीं तो ‘बहुमत’ का लाभ केवल चुनावी आँकड़ों में ही सीमित रह जाएगा।

साथ ही, केंद्र‑राज्य संबंधों में भी अतिरिक्त दबाव देखे जा सकते हैं। पश्चिम बंगाल की खनिज‑आधारित अर्थव्यवस्था, पोर्ट‑संकल्पित विकास और शहरी‑परियोजना के लिए पर्याप्त फंडिंग की अपेक्षा है। यदि नई मुख्यमंत्री इन केंद्रीकृत योजनाओं को राज्य की विशेषताओं के अनुकूल ढाल नहीं पाती, तो सरकारी दावे सिर्फ ‘नीति‑बॉक्स’ में टिकी रह जाएँगी।

अंततः, भाजपा को अब अपने दो‑तीहाई बहुमत को बुनियादी प्रशासनिक समस्याओं के समाधान में परिवर्तित करने की परीक्षा का सामना करना पड़ेगा। यह परीक्षा तभी सफल होगी जब शासन‑संकल्पना में ‘संस्थागत सुस्ती’ के सख़्त जवाबदेहियों को सम्मिलित किया जाएगा, न कि केवल पहचान के आधार पर व्यक्तियों को ‘बदलाव की मुहर’ के रूप में ताक‑झाक किया जाए।

Published: May 5, 2026