बीजेपी का विकास पर राज: शून्य से तीन तक की सवारी
राष्ट्रीय चुनाव में भाजपा ने अपने विकास रोड को प्रमुख मीटिंग‑टर्म बनाकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। पार्टी के नेता ‘शून्य से तीन’ के रूपक के माध्यम से यह दावा करते हैं कि उन्होँ ने गरीबी को ‘शून्य’ और आर्थिक विकास को ‘तीन गुना’ करने का लक्ष्य रखा है। जबकि चुनावी सभा में चमक‑दमक वाले आंकड़े सुनाए गये, वास्तविक प्रशासनिक कार्यान्वयन में कई बुनियादी खामियां उजागर हो रही हैं।
सबसे पहले, केंद्र सरकार द्वारा घोषित ‘डिजिटल इंफ़्रास्ट्रक्चर योजना’ के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में हाई‑स्पीड इंटरनेट कनेक्शन देने का लक्ष्य 2024‑25 में पूरा होना था। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, केवल 62 % गाँवों में बुनियादी बैंडविड्थ उपलब्ध है, जबकि शेष 38 % में फिर भी कनेक्टिविटी की कमी है। यह औसत ग्रामीण आय में वसूली का समर्थन नहीं कर पाता, जिससे विकास‑छत्र के नीचे आर्थिक असमानता बनी रहती है।
विकास के नाम पर कई प्रमुख परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाया गया, परन्तु पर्यावरणीय मंजूरी और स्थानीय वैधानिक निकायों की भूमिकाएँ अक्सर नज़रअंदाज़ की गईं। मध्य प्रदेश के वन्य‑संरक्षण क्षेत्र में स्थित एक नई औद्योगिक पार्क के मामले में, वन विभाग की रिपोर्टें अनदेखी कर, जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया को ‘आवेगपूर्ण’ कहा गया। परिणामस्वरूप स्थानीय समुदायों के साथ संघर्ष और फसलें क्षतिग्रस्त होने की खबरें सामने आईं, जो नीति‑निर्माण में ‘संकल्पना और कार्यान्वयन’ के बीच की खाई को उजागर करती हैं।
शहरी क्षेत्रों में ‘होस्टेल‑टू‑पर्यटन’ स्कीम के तहत बड़े‑पैमाने पर होटल निर्माण की अनुमति दी गई, परन्तु स्थानीय रोजगार में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। एक सरकारी रिपोर्ट (डेटा 2025‑26) के अनुसार, इन 15 बड़े‑होटलों में केवल 18 % कर्मचारियों को स्थानीय निवासियों ने भरता है, जबकि अधिकांश उच्च वेतन की मांग वाले पदों को बाहरी श्रमिकों ने ग्रहण किया। इस स्थिति में विकास का ‘सतहिय’ प्रभाव स्पष्ट है: राजस्व में वृद्धि तो है, पर सामाजिक‑आर्थिक समावेशन नहीं।
सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन के पहलू पर भी प्रश्न चिन्ह उभरते हैं। 2024‑25 के बजट में ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड’ का आवंटन 2.5 लाख करोड़ रूपए किया गया, परन्तु उष्मा‑ऊर्जा और जलसंधारण जैसे मूलभूत क्षेत्रों में खर्च 12 % से कम ही रहा। इस असंतुलन का कारण कई बार प्रशासनिक अकार्यक्षमता और परियोजना‑प्राथमिकता में ‘राजनीतिक तेज़ी’ बताया गया है।
आखिरकार, जनता की आशाओं और सरकार के विकास‑स्वीकार के बीच ‘सूत्रधार’ का अंतर बनता ही जा रहा है। विकास रोड को सिर्फ़ वोट‑खरीदने के साधन के रूप में प्रयोग करने से न केवल प्रशासनिक उत्तरदायित्व कमज़ोर होता है, बल्कि नीति‑निर्माण की दीर्घ‑कालिक स्थिरता पर भी सवाल उठते हैं। जब तक योजनाओं को जमीन‑स्तर पर ठोस निगरानी, पर्यावरणीय आत्मनिरीक्षण और सामाजिक‑समावेशी कार्य‑प्रणाली के बिना लागू किया जाता है, विकास का दावा केवल चुनावी मंच का ‘रंगीन जाल’ ही रहेगा।
Published: May 5, 2026