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Category: भारत

बीजेपी की जीत से पश्चिम बंगाल में नई दिल्ली‑कोलकाता‑ढाका संबंधों की दिशा बदलेगी

5 मई 2026 के सामान्य चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पश्चिम बंगाल में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। यह परिणाम राज्य के राजनैतिक नक्शे को ही नहीं, बल्कि नई दिल्ली‑कोलकाता‑ढाका त्रिकोणीय रिश्तों को भी नया दिशा‑निर्देश दे सकता है।

विवादित टेस्ता जल‑साझा समझौते की पुनर्जीवन, व्यापार‑वित्तीय जुड़ाव, और सीमा‑सुरक्षा सहयोग को अब एक ही मंच पर लाने की उम्मीद है। केन्द्रीय प्रशासन ने पहले ही कहा कि यह जीत “भारत‑बांग्लादेश संबंधों में भरोसा‑बनाने वाली पहल” का अवसर होगी, पर वास्तविक कार्यान्वयन में कई बुनियादी बाधाएँ मौजूद हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि एवं विधायी बदलाव

पिछले दो दशकों में त्रिवेणी (दिल्ली‑कोलकाता‑ढाका) संबंधों में जल‑विवाद, कस्टम‑विरोधी नीतियों और अनियमित सीमा‑गश्तें प्रमुख चुनौतियां रही हैं। टेस्ता जल‑साझा समझौता 2011 में दो पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित हुआ था, परन्तु 2014 के बाद से इसका व्यवहारिक कार्यान्वयन रुक गया। पश्चिम बंगाल में टीएमसी (त्रिनेत्रा मनत्री काँग्रेस) सरकार के दौरान कई बार संवाद टूटे, जिससे किसानों को जल‑संकट का सामना करना पड़ा।

केन्द्रीय‑राज्य‑संजॉय की कमियां

बीजेपी की जीत के बाद केंद्र ने “द्विपक्षीय जल‑सुरक्षा समूह” का गठन करने का इरादा जताया, परन्तु इस घोषणा के पीछे की संस्थागत तैयारी में गहरी सुस्ती नज़र आती है। जल एवं जल संसाधन मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, वाणिज्य मंडल तथा राज्य‑स्तर के जल‑प्रबंधन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, पिछले पाँच वर्षों में कई बार सामने आई है। बिना स्पष्ट प्रोटोकॉल के टेस्ता जल‑आवंटन की पुनः समीक्षात्मक प्रक्रिया, एक ही वक्त में दो बिंदुओं पर “विचार‑विमर्श” का दावा करती है, जो प्रशासनिक उत्तरदायित्व की कमी को उजागर करती है।

नीति‑निर्माण में व्यवधान और संभावित प्रतिकूलता

अगर जल‑संधि के पुनः आरंभ में अनावश्यक नौकरशाही की अडचनें नहीं हटाई गईं तो किसान‑समुदाय को फिर से निरंतर जलीय कमी का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, भारत‑बांग्लादेश सीमा के पार व्यापार के लिए निर्धारित “सुगम गलियों” की गति कई बार कागजी औपचारिकताओं में फँसी रही है। नई दिल्ली‑कोलकाता‑ढाका आर्थिक संबंधों के पुनरुत्थान के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचा—जैसे कि विशिष्ट सीमा‑कस्टम अडवांस्ड सिस्‍टम—अब तक निहित नहीं हुआ।

सार्वजनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिन्ह

अधिशेष में, नागरिकों को यह स्पष्ट नहीं है कि नई राज्य‑सरकार के प्रमुख किस हद तक जल‑संधि की फिर से बातचीत में भाग लेगी। जबकि पीएम कार्यालय ने “सामरिक स्थिरता” का उल्लेख किया, राज्य‑जिला स्तर पर जल‑बंटन के रिकॉर्ड‑कीपिंग और पारदर्शी रिपोर्टिंग की कमी, शासन की जवाबदेही को संदेहास्पद बनाती है। इस स्थिति में, न केवल किसान बल्कि छोटे व्यापारी और सीमा‑परिवार भी अस्थिरता के शिकार बन सकते हैं।

निष्कर्ष

बीजेपी की पश्चिम बंगाल जीत निश्चित रूप से तेल‑संधि, सीमा‑व्यापार और सुरक्षा सहयोग के पुनर्विचार को सुदृढ़ कर सकती है, परन्तु यह तभी साकार होगा जब केन्द्रीय और राज्य‑स्तर के प्रशासनिक ढाँचे में मौजूदा अक्षमताओं को खुलकर समुचित रूप से दूर किया जाए। नीति‑निर्माण में स्पष्ट रूपरेखा, त्वरित संस्थागत समन्वय और सार्वजनिक सहभागिता के बिना, “नई दिल्ली‑कोलकाता‑ढाका” त्रिकोणीय गठबंधन केवल कागजी रोडमैप तक ही सीमित रह सकता है।

Published: May 5, 2026