बंगाल में वैध मतदाता हटाए गए, पेशेवरों को नौकरी का खतरा
पुलिस अधिकारियों, शिक्षकों, डॉक्टरों और बीमा एजेंटों सहित कई वर्गों के पेशेवरों ने कल कोलकाता हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने बताया कि अतिरिक्त निर्वाचन सूची (SIR) में किए गए नाम हटाने से उनका नागरिक‑स्तर का प्रमाण नहीं रह जाएगा। परिणामस्वरूप, सरकारी नौकरियों में पदस्थापना, लाइसेंस एवं पहचान‑पत्रों को रद्द करने की संभावना उनके करियर को सीधे खतरे में डाल रही है।
इलेक्ट्रॉनिक वोटर सूची को सुधारने के नाम पर पश्चिम बंगाल में आयोजित SIR कार्य में लगभग 27 लाख वोटर के नाम हटा दिए गये। चुनाव आयोग का दावा है कि यह कदम डुप्लिकेशन, मृतकों और ग़लत प्रविष्टियों को समाप्त कर पंजीकरण को शुद्ध करने के लिये आवश्यक था। परंतु अनिश्चित साक्ष्य‑आधारित हटाव ने न केवल लोकतांत्रिक अधिकारों को बल्कि कई सार्वजनिक‑सेवा कर्मचारियों के रोजगार सुरक्षा को भी चुनौती दी है।
फाइल की गई याचिकाओं में प्रमुख सरकारी और अर्ध‑सरकारी संस्थानों के कर्मचारियों ने बताया कि उनके रोजगार अनुबंधों में मतदान अधिकार का प्रमाण अनिवार्य शर्त है। यदि मतदाता सूची से उनका नाम हट जाता है, तो उन्हें नागरिकता पर सवाल उठते ही बर्खास्तगी, स्थानांतरण या लाइसेंस रद्दीकरण का सामना करना पड़ सकता है। इस कारण से उन्होंने तात्कालिक सुनवाई की मांग की, परंतु कोर्ट ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया, यह संकेत देते हुए कि इस प्रकार के प्रशासनिक त्रुटियों को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही सुलझाया जाना चाहिए।
पर्यवेक्षणीय तंत्र के अभाव में इस प्रकार की त्रुटियाँ न केवल व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि शासन‑पद्धति की विश्वसनीयता पर भी धुंधलहरा प्रभाव डालती हैं। चुनाव आयोग की प्रक्रिया‑निर्धारण में पारदर्शिता की कमी, राज्य‑स्तरीय डेटा‑सत्यापन की अपर्याप्तता और त्रुटिपूर्ण सॉफ़्टवेयर लागू करने की लापरवाही को सवालों के घेरे में लाया गया है।
संबंधित प्राधिकरणों ने कहा कि हटाए गये नामों की पुनः जाँच चल रही है और प्रभावित नागरिकों को वैध दस्तावेज़ों के माध्यम से पुनः नामांकन की सुविधा दी जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस पुनः‑नामांकन प्रक्रिया में कई महीनों का समय लग सकता है, जबकि पेशेवरों को उनके रोजगार के तुरंत जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।
यह घटना भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे में निहित एक बड़ी खामी को उजागर करती है: जब तकनीकी सॉल्यूशन का उपयोग किया जाता है, तो उसकी जाँच‑परख, ग्रेस‑पीरियड और अपील‑मेकैनिज़्म को प्राथमिकता नहीं दी जाती। राज्य की नीति‑निर्माण प्रक्रिया में ऐसा व्यवधान संस्थागत सुस्ती और जवाबदेही‑हीनता का संकेत देता है, जिसमें सामान्य नागरिक को ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा में लगे करियर‑रहित कर्मचारियों को भी प्रभावित करता है।
व्यावहारिक प्रभाव को देखते हुए, यह आवश्यक है कि चुनाव आयुक्त को पुनः‑समीक्षा के साथ साथ एक त्वरित राहत‑योजना लागू करनी पड़े, जिससे हटाए गये मतदाताओं को तुरंत अस्थायी मतदान प्रमाणपत्र और रोजगार‑सुरक्षा की गारंटी मिल सके। इस प्रकार के कदम न केवल प्रशासनिक त्रुटि को सुधारेंगे, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को भी बहाल करेंगे।
Published: May 4, 2026