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Category: भारत

पश्चिम बंगाल में न्यायिक फैसले को ‘कट‑मनी’ और ‘तोलाबाजी’ ने कैसे जमीनी बना दिया

2011 में बामबाबू की भूमि सुधार और बाम दल के अधीर मतभेदों के खिलाफ उठे प्रदर्शन, केवल एक तरंग नहीं थी। यह वह क्षण था, जब जनता ने वामपंथी गठबंधन की ‘स्थिरता‑विहीन’ शासन शैली पर सवाल उठाया और आशा थी कि नया नेतृत्व सार्वजनिक सेवाओं को ठीक‑ठाक कर देगा।

आशा तेज़ी से ममता बनर्जी के प्रस्थान के साथ सामने आई। शुरुआती दिनों में उनके ‘बदलाव’ की छवि ने ग्रामीण‑शहरी दोनों वर्गों में एक नई ऊर्जा भर दी। परंतु पाँच वर्ष बाद, जब प्रशासन ने ‘कट‑मनी’ को बजट में ‘संरचनात्मक घटक’ बनाकर पेश किया, तो वही विमर्श फिर से उभरा।

‘कट‑मनी’ शब्द, जो मूलतः अनियंत्रित खर्च को रोकने के इरादे से आया था, जल्द ही स्थानीय ‘सिन्डिकेट’ एवं ‘तोलाबाजी’ के अभिन्न अंग बन गया। निर्माण‑कार्यक्रमों में—बड़ी‑बड़ी दलान‑दहलीज, सड़कों के विस्तार, जल‑सेवा परियोजनाएँ—प्रत्येक अनुबंध में मध्यस्थों की गिरहें बंधने लगीं। यह न केवल सार्वजनिक निधि के अपव्यय को बढ़ावा देता है, बल्कि सामान्य नागरिक के छोटे‑मोटे मरम्मत कार्यों को भी जटिल बना देता है।

सरकारी विभागों की प्रतिकृति‑प्रतिक्रियाएँ इस अवस्था को बदनाम करने में असफल रहीं। जब शिकायतकर्ता रिपोर्ट कराते, तो अक्सर उत्तर में कहा जाता था, “अनुशासन के तहत कार्यवाही चल रही है।” वास्तव में, कई मामलों में तो नजदीकी ‘सिन्डिकेट’ के सदस्य ही निरीक्षण अधिकारी बनते दिखे। इस प्रकार, नीति‑निर्माण में मौजूद कवच‑कोट की पुष्टि होती रही।

इस परिप्रेक्ष्य में ‘तोलाबाजी’ का शब्द विशेष महत्व रखता है। यह शब्द छोटे‑मोटे कार्यों में अतिरिक्त शुल्क, अनुचित निरीक्षण, और अनावश्यक प्रमाणपत्रों के लिए अतिरिक्त रसीदें लेन‑देने को दर्शाता है। रोज़मर्रा के घरों में, टाइल‑बदलाव से लेकर पानी की पाइपलाइन लगवाने तक, लोग इस अभ्यस्त प्रथा से जूझते रहे हैं। यह न केवल अर्थव्यवस्था के सूक्ष्म स्तर पर बोझ बनता है, बल्कि प्रशासनिक दायित्व के प्रति जनता के विश्वास को भी धूमिल करता है।

वर्तमान में, राज्य सरकार ने इस समस्या को ‘प्रशासनिक सुस्ती’ के रूप में नामित किया है और कई ‘डिजिटल निगरानी’ के प्रयोगों की घोषणा की है। परंतु, बिना संरचनात्मक बदलाव के केवल तकनीकी समाधान—जैसे ऑनलाइन फ़ॉर्म – लागू करने से ‘सिन्डिकेट’ के जुड़ाव को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्‍हें वास्तविक शक्ति‑संतुलन, कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई, तथा सार्वजनिक उत्तरदायीता की आवश्यकता है।

न्यायिक फैसले को ‘जमीनी’ बनाने की प्रक्रिया में यह स्पष्ट हो गया है कि केवल विधायी या कार्यनिष्पादक आदेश पर्याप्त नहीं। जमीनी स्तर पर ‘कट‑मनी’, ‘सिन्डिकेट नियंत्रण’ और ‘तोलाबाजी’ के जाल को तोड़ने के लिये नीति‑निर्माताओं को कड़ाई से ‘पारदर्शिता’ सुनिश्चित करनी होगी, साथ ही नागरिकों को न्यायसंगत शिकायत‑निराकरण के साधन उपलब्ध कराने होंगे। तब ही यह कहा जा सकेगा कि पश्चिम बंगाल में न्यायिक फैसले केवल कागज़ पर ही नहीं, बल्कि जनता की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी स्थायी प्रभाव डालेंगे।

Published: May 5, 2026