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Category: भारत

पश्चिम बंगाल चुनाव: एसआईआर के बाद भी बीजेपी ने मतुआ समुदाय का समर्थन बनाए रखा

मई 2026 में समाप्त हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने मतुआ समुदाय से मिलने वाले मतों में उल्लेखनीय निरंतरता दिखाई। राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए ‘स्पेशल इम्प्रूवमेंट रिपोर्ट’ (एसआईआर) के बाद भी मतुआ वर्ग ने भाजपा को अपना समर्थन देना जारी रखा, जो प्रदेशीय राजनीति में एक नई प्रवृत्ति दर्शाता है।

एसआईआर, जिसका उद्देश्य मतुआ समुदाय की सामाजिक‑आर्थिक स्थिति का आंकलन कर प्राइमरी स्तर पर लक्षित कार्यक्रमों का मार्गदर्शन करना था, को सरकार ने 2025 के अंत में सार्वजनिक किया था। रिपोर्ट में कई बिंदुओं पर प्रशासनिक निष्क्रियता और तरंगित योजना‑निति की कमी उजागर की गई थी, जिसमें कुशल पहचान‑पंजीकरण, शैक्षणिक विशेष प्रवर्तनों और निवारक स्वास्थ्य उपायों का उचित वितरण नहीं हो पाया। इसके बावजूद, मतुआ वर्ग ने चुनाव में बीजेपी को 28 % से अधिक वोट शेयर दिया, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को इस वर्ग से केवल 22 % मिल सके।

विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की सफलता का मुख्य कारण केंद्र सरकार द्वारा 2019 में शुरू किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पहचान योजना (एनआईसी) के तहत दी गई स्पष्ट वादा‑बद्धताएँ थीं। इन योजनाओं को कई बार ‘सुरक्षित शरणस्थान’ की आशा के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे मतुआ समुदाय के बड़े हिस्से ने भरोसा रखा। दूसरी ओर, राज्य‑स्तरीय टीएमसी ने एसआईआर के बाद भी तुरंत ठोस कार्यवाही नहीं कर पायी, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठे।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया में स्पष्ट लापरवाही दिखी। एसआईआर के निष्कर्षों के बाद नियुक्त विशेष प्रयुक्त टीम को केवल औपचारिक स्तर पर रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित रखा गया, जबकि वास्तविक नीतिगत सुधारों को लागू करने के लिये बजट आवंटन, ग्राउंड‑लेवल निगरानी और निचली स्तर की सिविल सेवा प्रशिक्षण में गंभीर कमी रह गई। इस प्रकार की संस्थागत सुस्ती ने मतदाता वर्ग में सरकारी योजनाओं के प्रति भरोसे को और कमज़ोर किया।

निवेशकों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने इस असंतुलन को ‘नीति‑निर्माण में राष्ट्रीय‑राज्य समन्वय की विफलता’ के रूप में अभिव्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एशिया‑प्रेसिडेंट उन्नत डाटा‑एकीकरण, विस्तृत सामाजिक सुरक्षा कवरेज और प्राथमिक स्वास्थ्य‑सुविधा के लिए त्वरित उपायों की आवश्यकता है, अन्यथा ‘विकास की अमूर्त वादाबाजी’ केवल चुनावी लाभ तक सीमित रह जायेगी।

भविष्य की दिशा में, विशेषज्ञों का तर्क है कि राज्य सरकार को एसआईआर के निष्कर्षों को भिन्न‑भिन्न प्रशासनिक स्तरों पर अपनाना चाहिए, जिसमें ग्राम-स्तर पर पुनः पंजीकरण, शैक्षणिक भर्तियों में आरक्षण का सुदृढ़ीकरण और स्वास्थ्य‑सेवाओं के लिए विशेष फंड की स्थापना शामिल हो। साथ ही, केंद्र‑राज्य संवाद मंच को सुदृढ़ करके नीतियों के ठोस कार्यान्वयन की निगरानी की जानी चाहिए।

संक्षेप में, पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में बीजेपी ने मतुआ वोटों को बनाए रखा, जबकि प्रशासनिक ठहराव और नीति‑निर्माण में असंगतियों ने राज्य सरकार की क्षमताओं को प्रश्नवाचक बना दिया। जनता के भरोसे को पुनः स्थापित करने के लिये केवल शब्दों से नहीं, बल्कि सुदृढ़ प्रशासनिक तंत्र और जवाबदेह नीतियों से ही संभव होगा।

Published: May 5, 2026