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प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह शनिवार को बंगाल में पहली भाजपा मुख्यमंत्री की शपथ समारोह में उपस्थित होंगे
बिहार के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से उत्पन्न हुई राजनीतिक उलटफेर के बाद, केंद्रीय नेतृत्व ने पश्चिमी बंगाल में निर्धारित कार्यक्रम को न बदलकर, राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार भाजपा के राज्यमुखी पर शपथ लेना तय किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह शनिवार को नई मुख्यमंत्री की ‘ब्रिगेड ओथ’ में मौखिक रूप से भाग लेंगे। यह कदम, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस‑सेनेंटर के प्राचीन आडंबर को तोड़ते हुए, भाजपा के इस क्षेत्र में पहली सत्ता‑संधि को प्रतीकात्मक रूप से सुदृढ़ करता है।
पहली बात तो यह है कि इस समारोह की तिथि चयन से यह स्पष्ट होता है कि केंद्र ने अपने राजनयिक अभ्यागत को ‘व्यवहारिकता’ के बजाय ‘राजनीतिक तड़का’ के लिये चुन लिया है। बहरहाल, इस तरह की महँगी पार्टी‑क्रिया में सार्वजनिक संसाधन — दुरुस्त सुरक्षा व्यवस्था, ट्रैफिक नियंत्रण, और स्थानीय प्रशासनिक बैंडविड्थ — को ‘राजनीति’ के नाम पर उपयोग किया गया। यह प्रशासनिक लापरवाहियों का स्पष्ट उदाहरण है, जहाँ नागरिक सुविधा के बजाय पार्टी का शोभा प्रमुख बना।
बांग्लादेश की सीमा के निकट स्थित इस राज्य में, पिछले कुछ वर्षों में जलवायु‑अनुकूल बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य सेवाएँ और शैक्षणिक संस्थानों की गिरावट स्पष्ट हुई है। हालांकि, इस समारोह में केन्द्र सरकार ने झंडे‑बाज़ी से लेकर ‘जनता‑के‑लिए‑औद्योगिकीकरण’ के कई घोषणात्मक बयानों की व्यवस्था बनाई है। ऐसे बयानों का प्रभाव तभी दिखेगा जब वास्तविक नीतियों की कार्यवाही का परीक्षण किया जाए, न कि सिर्फ़ रैलियों में फंसा रहे।
राज्य के नए मुख्यमंत्री को ‘ब्रिगेड ओथ’ के पुष्पलेख में शपथ लेने से यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक शक्ति का केंद्रीकरण तेज हो रहा है। यह ‘ब्रिगेड’ शब्द स्वयं में एक सूक्ष्म संकेत देता है — कि भविष्य में पार्टी के अनुशासन को लागू करने के लिये नयी ‘सैन्य‑सदृश’ संरचनाएँ तैयार की जा सकती हैं। ऐसी प्रवृत्ति संस्थागत स्वतंत्रता को कमज़ोर कर सकती है, जहाँ राज्य मशीन केवल पार्टी के आदेशों का पालन करेगी, न कि संवैधानिक गवर्नेंस का।
केंद्रीय स्तर पर इस प्रमुख यात्रा को बनाये रखने के पीछे एक रणनीतिक मंशा भी छिपी है: आगामी विधानसभा चुनावों में विपक्षी गठबंधन को तोड़‑फोड़ कर, भाजपा को राज्य‑स्तर पर नई भूमि देना। परंतु, इस तरह के ‘राजनीतिक सजावट’ के बाद, जनता को वास्तविक लाभ कब मिलेगा — यह सवाल अभी अनुत्तरित है। जलसंधि, रोजगार सृजन, ग्रामीण स्वास्थ्य इत्यादि मुद्दों पर ठोस कार्य‑योजना के अभाव में, सरकार की जवाबदेही दशा में ही रहने का खतरा है।
संक्षेप में, प्रधानमंत्री मोदी और अमित अहमद शाह की इस यात्रा ने राजनीतिक महत्व को एकत्र किया, पर प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह सवाल उठता है कि क्या यह ‘राजनीतिक उत्सव’ जनता की बुनियादी जरूरतों को संबोधित कर पाएगा, या केवल सत्ता‑कीक्षा की एक अनिवार्य करवट है। इस दौर में सार्वजनिक उत्तरदायित्व, नीति‑निर्धारण में पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता के सिद्धांत ही एकमात्र शील्ड हैं, जो इस ‘ब्रिगेड’ को लोकतांत्रिक रूप से सीमित रख पाएँगे।
Published: May 7, 2026