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Category: भारत

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पोंछीशी बौषाख पर रबीन्द्रनाथ टैगोर को दी विशिष्ट श्रद्धांजलि

आज पोंछीशी बौषाख (रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्मदिन) के अवसर पर दिल्ली में आयोजित सभा में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने टैगोर को "भारतीय सभ्यता की शाश्वत आवाज़" कहा। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री‑मंत्री‑श्री सुवेंदु अधीर ने उन्हें "बंगाली साहित्य का शाश्वत सितारा" करार दिया। दोनों ने Nobel‑पुरस्कार विजेता की साहित्य, दर्शन, शिक्षा और सांस्कृतिक योगदान को उजागर किया।

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्तर की पार्टी‑निर्माण और शासकीय प्रेझेंसे के बीच एक तंग नज़र से देखना पड़ता है। केंद्र सरकार ने अक्सर सांस्कृतिक महोत्सवों को राजनयिक मंच बनाकर विदेशी और घरेलू दोनों दर्शकों को आकर्षित किया, पर यह स्थायी नीति‑निर्माण से अलग एक प्रतीकात्मक कदम बना रहता है। मुख्यमंत्री‑मंत्री‑श्री अधीर की उपस्थिति, जो अभी‑अभी सत्ता के चुनावी दल में प्रवेश कर चुके हैं, इस बात का संकेत देती है कि "सांस्कृतिक प्रतीकों" को चुनावी धरातल पर उपयोग करने की प्रवृत्ति अब भी बनी हुई है।

ऐसे विश्लेषण में यह प्रश्न उठता है कि टैगोर के नाम पर स्थापित संस्थानों – जैसे रवीन्द्र भवन, टैगोर केंद्र और विभिन्न शैक्षणिक पद्धतियों – को आवश्यक वित्तीय समर्थन कब मिलेगा। पिछले दशक में कई रिपोर्टों ने बताया है कि इन संस्थाओं के बजट में कटौती, ब бюराक्रेटिक अड़चनें और अनावश्यक पदावनति' ने साहित्यिक उत्पादन को बाधित किया है। वक्तव्य में कवियों को "शाश्वत" कहा गया, पर वास्तविकता में अक्सर कवियों को बुनियादी सुविधा, पब्लिकेशन ग्रांट और डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

सरकारी पक्ष से जारी किए गए अधिकारिक बयान में संस्कृति को राष्ट्रीय एकता का स्तम्भ कहा गया, पर बुनियादी स्तर पर नीति‑निर्माण की सुस्ती स्पष्ट दिखती है। टैगोर के विचार‑धारा के अनुसार शिक्षा-नीति में लोकतांत्रिक संवाद को बढ़ावा देना चाहिए, पर अब भी कई राज्यों में शैक्षणिक पाठ्यक्रम के पुनरावृत्ति में केन्द्र‑राज्य समन्वय की कमी देखी जा रही है। इस असंगति को "विरासत का मानदंड" कहलाने वाले समारोह में याद दिलाना अनिवार्य हो गया है।

नागरिकों की अपेक्षा यह है कि ऐसे स्मारक समारोह केवल अभिलेखीय उद्देश्यों तक सीमित न रहें, बल्कि ठोस नीतियों, वित्तीय अनुबंधों और कार्यान्वयन की जवाबदेही को सुदृढ़ करें। शुष्क व्यंग्य के साथ कहा जा सकता है कि राजनेताओं की कवि‑भूषण अब सीवी में जोड़ना आसान हो गया, पर कवियों के लिए बुनियादी सुविधा अभी भी एक दूर के सपने की तरह दिखती है। अंततः, टैगोर की शाश्वत आवाज़ को वास्तविकता में उतारने की जिम्मेदारी शासक दल की ही नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक समाज की भी है।

Published: May 9, 2026