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निर्लज्ज ड्राइविंग से रोज़ 495 मौतें, दोपहिया सवारों की हिस्सेदारी 48%
राष्ट्रीय आपराधिक अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के नवीनतम आँकड़े एक बौहिमयी तथ्य उजागर करते हैं: देश में प्रतिदिन औसत 495 लोग लापरवाह ड्राइविंग कारणों से शहीद होते हैं। इस आँकड़े की सबसे चौंका देने वाली बात यह है कि लगभग आधे से अधिक (48%) मृत्युओं में दोपहिया सवार शामिल हैं। यह आँकड़ा न केवल सड़क सुरक्षा की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि नीति निर्माताओं के कार्य‑प्रवाह में मौन झलक भी प्रस्तुत करता है।
समय‑सीमा स्पष्ट है—डेटा 2025‑26 वित्त वर्ष के भीतर संकलित किया गया है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि पिछले वर्ष के इसी अवधि की तुलना में मृत्युदर में कोई उल्लेखनीय गिरावट नहीं आई है। इस दौरान उत्तर-पूर्वी राज्यों में उच्चतम मृत्यु दर दर्ज की गई, जबकि बड़े शहरी केन्द्रों में दोपहिया सवारों की भागीदारी विशेष रूप से अधिक रही।
सरकारी प्रतिक्रिया में, राष्ट्रीय सुरक्षा परिपत्र और राज्य‑स्तर पर ‘सुरक्षित सड़कों की पहल’ का उल्लेख अक्सर किया जाता है, पर वास्तविक कार्यान्वयन में खाई महसूस की जा रही है। हेल्मेट प्रावधान, गति सीमा प्रतिबंध, तथा तेज़-तीव्रता वाले वाहनों के लिए बेतरतीब जांचें इस आँकड़े को बदलने में असमर्थ प्रतीत होती हैं। ट्रैफिक पुलिस द्वारा दंडात्मक कार्रवाई की संख्या में वृद्धि का दावा किया जाता है, पर यह दावा अक्सर उन 495 दैनिक मौतों के साथ व्यंग्यात्मक विरोधाभास बन जाता है जो अभी भी अनछुए ही रह जाती हैं।
नीति‑निर्माण के स्तर पर, कई विशेषज्ञ ‘ड्राइवर प्रशिक्षण के मानकों को कठोर बनाना, सार्वजनिक जागरूकता अभियानों में निरंतरता लाना, तथा ओएमवी (ऑफ़‑रोड मोड वैलीडेशन) जैसी तकनीकी निगरानी प्रणालियों को लागू करना’ जैसे उपायों का सुझाव देते हैं। परन्तु इन प्रस्तावों को अक्सर ‘दूध का दही’ कहा जाता है—बिल्कुल तैयार, पर व्यवहार में लागू नहीं।
प्रशासनिक सुस्ती का एक और पहलू है—आकाशवाणी और समाचार माध्यमों में सड़क सुरक्षा पर विशेष कवरेज का अभाव। जब तक कोई बड़ी त्रासदी नहीं होती, तब तक नीतियों की समीक्षा व सुधार की गति नज़रअंदाज़ होती दिखती है। इस प्रकार ‘बिना नज़र के सड़क’ बनी रहती है, जहाँ नियम‑कायदे मौजूद होते हैं, पर उनका पालन करना किसी कोरपोरेट कार्यप्रणाली से कम नहीं लगता।
सारांशतः, 495 दैनिक मृत्यु आँकड़ा न केवल भारतीय सड़कों की खतरनाक वास्तविकता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि मौजूदा प्रशासनिक ढाँचा और नीति‑निर्माण प्रक्रिया में गहरी जड़ें पकड़ चुकी अकार्यक्षमता है। अब प्रश्न यही बना रहता है—क्या सरकार इस आँकड़े को मात्र आँकड़े में ही सीमित रखेगी, या वास्तविक उपायों के माध्यम से दोपहिया सवारों की सुरक्षा का बुनियादी स्तर भी पुनर्विचार करेगी।
Published: May 7, 2026