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Category: भारत

दिल्ली के सूडानी किशोर को मिला जीवनरक्षक दिल, पंचकुला से आया दानहार अंग

दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में 14‑साल के सूडानी किशोर ने आज जीवनरक्षक दिल प्रत्यारोपण करवाया। यह दिल हरियाणा के पंचकुला में 41‑साल की एक महिला से प्राप्त हुआ, जिसे मस्तिष्क मृत्यु घोषित करने के बाद उनके परिवार ने उदारतापूर्वक दान के लिए सहमति दी।

दुर्भाग्यवश, भारत में प्रत्येक वर्ष सैकड़ों हजारों रोगियों को अंग की कमी का सामना करना पड़ता है। इस मामले में, राज्य‑बीच के सहयोग को जल्दी से लागू किया गया—ऑक्सीजन‑समृद्ध हवाई परिवहन, दो रजिस्टर्ड नोडल अधिकारियों की आपातकालीन स्वीकृति और दिल्ली के प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञों का तत्पर सहयोग। लेकिन इस तीव्र प्रक्रिया के पीछे कई प्रशासनिक असंस्थाओं की छाया स्पष्ट दिखी।

पहले, दान‑प्रक्रिया को मंजूरी मिलने में कभी‑कभी कई घंटे के फ़ॉर्म‑फिलिंग और बहु‑स्तरीय मंजूरी की बाधा आती है। जहाँ परिवार की सहमति स्पष्ट थी, वहीं स्थानीय अस्पताल को राष्ट्रीय अंग ट्रांसप्लांट नेटवर्क (NOTTO) द्वारा जारी प्रमाणपत्र और ट्रांसफर अनुमति प्राप्त करने में अनावश्यक देरी का सामना करना पड़ा। इस कारण, कई बार हृदय को ठंडा करने के लिए मानक समय‑सीमा करीब‑करीब समाप्त ही हो जाती है, जिससे जीवन‑रक्षित प्रत्यारोपण की संभावना घट जाती है।

दूसरे, इस घटना ने भारत की मौजूदा organ‑donation नीति में मौजूद अंतर को उजागर किया। वर्तमान में, दाता‑परिवार को सामाजिक‑आर्थिक सहायता, कर‑राहत या मान्यतापत्र देने की व्यवस्था राष्ट्रीय स्तर पर असंगत है, जिससे कई परिवारों में दान‑के‑लिए हिचकिचाहट रहती है। पंचकुला की इस महिला के परिवार की ‘बहादुरी’ केवल व्यक्तिगत नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक समर्थन की कमी के सामने एक अपवाद है।

तीसरा, अंतर‑राज्यीय लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था में भी प्रणालीगत लापरवाही नज़र आती है। हृदय को हवाई मार्ग से दिल्ली तक पहुँचाने के लिए उपयोग किए गए बुकिंग सिस्टम में दो‑तीन बार रूट‑ परिवर्तन और एयरक्राफ्ट उपलब्धता में देरी हुई, जिससे ट्रांसपोर्ट को योजनाबद्ध समय‑सीमा से बाहर होने का जोखिम था। इस लेख को पढ़ते समय यह स्पष्ट है कि यदि राज्य के बीच डेटा‑शेयरिंग और वास्तविक‑समय मोनिटरिंग को सुदृढ़ किया जाए तो ऐसी अनिवार्य व्यवधानों से बचा जा सकता था।

आधिकारिक प्रतिक्रियाओं में अस्पताल के मुखिया ने इस सफल प्रत्यारोपण को ‘मेडिकल प्रौद्योगिकी और राष्ट्रीय एकजुटता का प्रतीक’ कहा, जबकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘अंगदान के प्रति जागरूकता अभियान को तेज करने’ का आश्वासन दिया। किन्तु वास्तविक सुधार की दिशा में ठोस कदमों की कमी अभी भी प्रमुख चिंता बनी हुई है।

सारांशतः, इस दिल के सफल प्रत्यारोपण से यह सिद्ध होता है कि जब प्रशासनिक जाँच‑पड़ताल को कम कर, तेज‑तर्रार निर्णय‑लेना संभव हो, तो जीव बचाने में अभूतपूर्व उपलब्धियों को हासिल किया जा सकता है। यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत जीत है, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य‑प्रणाली के ‘संस्थागत सुस्ती’ और ‘नीति‑अल्पता’ की आलोचना का अवसर भी बनती है। भविष्य में अगर राज्य‑स्तरीय अंग‑डाटा बेस को एकीकृत, दाता‑परिवार के लिए स्पष्ट लाभ‑प्रद संरचना प्रदान और ट्रांसपोर्ट‑लॉजिस्टिक्स को पेशेवर सेवा में बदल दिया जाए, तो ऐसी कहानियों को ‘बहादुर परिवारों की अपवाद’ की जगह ‘प्रत्येक रोगी की अपेक्षित आशा’ बना दिया जा सकेगा।

Published: May 4, 2026