तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके को 1996 के बाद सबसे बड़ी हार, ई.पी.एस. का नेतृत्व संकट गहरा
5 मई 2026 को आयोजित तमिलनाडु विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति में एक अहम मोड़ दिखा दिया। एआईएडीएमके, जिसने दो दशकों से अधिक अवधि तक प्रदेश की धाक कायम रखी, इस बार 1996 के बाद का सबसे बड़ा चुनावी नुकसान उठाया। पार्टी के प्रमुख अधिनेताओं में से एक, ए.के. पालीसवामी (ई.पी.एस.) की काबिलियत पर अब सवाल उठे हैं, क्योंकि उनके नेतृत्व में मिली गिरी असंतोष की लहरें स्पष्ट रूप से मतपत्रों में प्रतिबिंबित हुईं।
परिणामों से स्पष्ट हो रहा है कि एआईएडीएमके का पारंपरिक वोट‑बेस अब पहले की तुलना में कमजोर हो गया है। पिछली सरकारों में जल‑सिंचाई, स्वच्छता और श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में कई योजनाएँ शुरू की गई थीं, परन्तु इन योजनाओं का कार्यान्वयन अक्सर ‘कागज पर’ ही रहे। समय पर फंडिंग की कमी, प्रशासनिक लचीलेपन की कमी और विभागीय ‘जालबंदी’ ने कई परियोजनाओं को ठहराव की स्थिति में डाल दिया। इस ‘संस्थागत सुस्ती’ ने जमीन‑स्तर के नागरिकों को सीधे प्रभावित किया, जिससे एआईएडीएमके पर भरोसा खो गया।
इस electoral defeat में बीजेपी के साथ गठबंधन का भी बड़ा योगदान रहा। गठबंधन के दौरान कई बार ई.पी.एस. के दलों को राष्ट्रीय पार्टी की नीतियों को स्वीकार करने के लिए दबाव बनाया गया, जिसमें अक्सर स्थानीय हितों के साथ टकराव हुआ। कई मतदाता इस बात से असहज थे कि राज्य की स्वायत्तता कम होती जा रही है और भ्रष्टाचार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। परिणामस्वरूप, गठबंधन को ‘सबसे बड़े सब्जेक्टिव रीयर कीज’ के रूप में देख जाने लगा, जहाँ बीजेपी को ‘विल्यन गवर्नेंस’ के प्रतीक के रूप में अनुभव किया गया।
इसके साथ ही, एआईएडीएमके के भीतर मौजूदा विभाजन को विरोधी दलों ने सफलतापूर्वक exploited किया। पार्टी के युवा कार्यकारियों और स्थानीय स्तर के नेता, जो लंबे समय से ‘निवेश‑के‑साथ‑सफलता’ के नारे पर खड़े थे, अब अलग‑अलग ध्रुवीकरण की ओर झुक रहे हैं। इस आंतरिक अस्थिरता ने मतदाता वर्ग को स्पष्ट विकल्प प्रस्तुत करने का काम किया – चाहे वह पूर्वी कांचीपुरम में नई युवा राजनीति हो या युवा आर्टिसन वर्ग को आकर्षित करने वाली नई गठबंधनें।
नए राजनीतिक बलों की मौखिक और सामाजिक मीडिया में बढ़ती लोकप्रियता इस बात को दर्शाती है कि तमिलनाडु का राजनैतिक परिदृश्य अब केवल दो-ध्रुवीय नहीं रह गया। ये नई गठबंधनें अक्सर प्रशासनिक पारदर्शिता, लोककल्याण के लिए ‘सटीक निगरानी’ और डिजिटल सेवाओं के समानुपातिक वितरण को प्रमुख मुद्दे बनाती हैं। ऐसी मांगें विशेष रूप से उन नागरिकों में प्रतिध्वनित होती हैं, जिन्होंने पिछले दो दशक में बुनियादी सुविधाओं की कमी और भ्रष्टाचार के सुभाव को महसूस किया है।
सारांश में, एआईएडीएमके की हार न सिर्फ एक पार्टी के लिए चुनावी झटका है, बल्कि तमिलनाडु की शासन‑प्रणाली में निहित व्यस्थात्मक खामियों का प्रतिबिंब है। यदि भविष्य में प्रशासनिक उत्तरदायित्व, नीति‑निर्माण में सामुदायिक भागीदारी और संस्थागत सुदृढ़ता को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो नई राजनीतिक ताकतीयाँ सुविधाओं के वितरण में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की संभावना को बढ़ा देंगी। इस परिप्रेक्ष्य में, ई.पी.एस. को अब अपने नेतृत्व को पुनः परिभाषित करना होगा, न कि केवल पदों का रखरखाव।
Published: May 5, 2026