तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026: डिमके जीत में कांग्रेस का सीमित लाभ
2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में यदि द्रविड़ मुन्सत्र क़जाघ (डिमके)‑प्रधान गठबंधन सत्ता में प्रवेश करता है, तो यह प्राथमिकता के रूप में मौजूदा प्रशासन के नेतृत्व का ही समर्थन माना जाएगा। मुख्य मुद्दा बन जाएगा मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की व्यक्तिगत छवि, जो गठबंधन के भीतर सत्ता की धुरी बनी हुई है।
डिमके की जीत के बाद राज्य के प्रमुख नीतियों—स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढाँचा—को फिर से स्टालिन के पदचिह्न पर लिपटाया जाएगा। इसी कारण, कांग्रेस को, चाहे वह कितनी भी सीटें जीत ले, सच्ची शासन‑दायित्व से वंचित रहना पड़ेगा। गठबंधन के भीतर कांग्रेस को केवल अल्प प्रतिनिधित्व और औपचारिक भागीदारी का ही लाभ होगा।
कांग्रेस की यह ‘जुड़ाव‑पर‑रहना’ स्थिति न केवल राजनीति‑परिदृश्य को धुंधला करती है, बल्कि नीति‑निर्माण में भी एक अड़चन बनती है। केंद्रीय आयोग और राज्य सरकार के बीच सहयोग के मामले में, कांग्रेस का कमजोर स्वर अक्सर स्थानीय प्रशासनिक कार्रवाई को अस्पष्ट कर देता है। इस तरह की स्थिति से लोगों के अपेक्षित लाभों में बाधा उत्पन्न होती है, जबकि सत्ता‑में रहने वाले दल को पूरे इर्द‑गिर्द के प्रशासनिक प्रशंसा मिलती रहती है।
इस गठबंधन में संस्थागत सुस्ती भी स्पष्ट दिखाई देती है। राजकीय योजनाओं की कार्यान्वयन गति में देरी, बजट आवंटन में पारदर्शिता की कमी और निगरानी‑प्रणाली की अपर्याप्तता—इन समस्याओं का समाधान कांग्रेस के औपचारिक भागीदारी से नहीं, बल्कि वास्तविक शक्ति‑संतुलन से संभव है। वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस को ‘छोटे चम्मच’ की तरह बड़े बर्तन में रखा गया है, जिससे वह न तो स्वाद ले सकें और न ही पोषक तत्वों को प्रभावी ढंग से वितरित कर सकें।
निराकरण के लिए स्पष्ट नीति‑निर्माण और जवाबदेही की आवश्यकता है। यदि कांग्रेस वास्तव में तमिलनाडु के विकास में योगदान देना चाहता है, तो उसे गठबंधन के भीतर सत्ता‑संरचना को पुनर्संरचित करने, प्रमुख निर्णय‑मंचों में सीटें सुरक्षित करने और राज्य‑स्तरीय प्रशासनिक सुधार के लिए एक ठोस एजेंडा पेश करने की मांग करनी होगी। अन्यथा, आगामी चुनावों में ‘जुड़ाव‑पर‑रहना’ ही कांग्रेस का मुख्य लाभ रहेगा, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया को वास्तविक शक्ति‑संतुलन से दूर रखेगा।
Published: May 3, 2026