विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
तमिलनाडु में सरकार बनाब में उलटफेर: टिवीके की एकतरीफ़ी जीत, गठबंधनों की अस्थिरता
हालिया विधानसभा चुनावों के परिणाम स्वरूप टिवीके (TVK) ने 124 में से 115 सीटों के साथ तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर आया। हालांकि, वह 126‑सदस्यीय बहुमत से 11 सीटें कम है, जिससे सत्ता‑संरचना अनिश्चित बनी हुई है।
परिणाम घोषणा के बाद दोनों प्रमुख विपक्षी दल – दक्षिण तमिलनाडु कम्युनिस्ट गठबंधन (DMK) और आंध्र भारत राष्ट्रवादी पार्टी (AIADMK) – ने अपने‑अपने दलों को पुनःछांटा। कई छोटे गठबंधन पार्टियों ने टिवीके को अस्थायी समर्थन देने का संकेत दिया, जबकि कुछ ने मौजूदा समझौतों को फिर से खुला रखने की मांग की। इस बीच, कई राजनेता पीछे‑पीछे अपने समर्थन को हटाते या बदलते दिखे, जिससे राजनीतिक माहौल अस्थिर हो गया।
विजय (विजय) की शक्ति‑की‑खोज इस दौर में विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। वह न केवल अन्य दलों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि अपने निजी नेटवर्क के माध्यम से गुप्त समझौतों की बातचीत भी कर रहे हैं। यह “बैक‑चैनल डील” की लहर, जो आधिकारिक रूप से कहीं नहीं दिखती, पर राजनैतिक दलों के भीतर गहरी अस्वीकृति का कारण बनती है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से इस अराजकता में प्रमुख दो कमियाँ उजागर हुईं। प्रथम, चुनाव आयोग ने गठबंधन‑प्रक्रिया को नियंत्रित करने हेतु स्पष्ट दिशानिर्देश जारी नहीं किए, जिससे दल‑स्तर पर मौखिक समझौते ही प्रमुख बन गये। द्वितीय, राज्य शासन में उपस्थित उच्च अधिकारी, जो सामान्यतः सत्ता‑स्थानांतरण के समय वैधानिक कार्यवाही को जल्दी‑जल्दी समाप्त कर देते हैं, इस बार “इंतजार” की नौकरशाही में फँस गये। ऐसी सुस्ती न केवल नीति‑निर्माण को ठप्प करती है, बल्कि सार्वजनिक सेवाओं – स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी इंफ़्रास्ट्रक्चर – में देरी का कारण बनती है।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि तमिलनाडु में मौजूदा संस्थागत ढाँचा निरंकुश गठबंधन‑परिवर्तन को रोकने में विफल है। जब छोटे दलों के प्रतिनिधि आसानी से समर्थन बदल सकते हैं, तो लंबे‑कालिक विकास‑नीतियों की स्थायित्व पर प्रश्न उठते हैं। दायित्व को स्पष्ट करने के लिए, राजनैतिक दलों को मौखिक समझौतों के बजाय लिखित समझौते प्रस्तुत करने, तथा चुनाव आयोग को “गठबंधन‑पंजीकरण” प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है।
साथ ही, केंद्र सरकार को भी इस संदर्भ में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए – न कि केवल दावों तक सीमित रहकर, बल्कि राज्यों में सत्ता‑स्थापना के दौरान प्रशासनिक तत्परता सुनिश्चित करने के लिये केंद्र‑राज्य सहयोग के तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये। वर्तमान में तमिलनाडु का राजनीतिक परिदृश्य, जबकि एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, लेकिन उसकी दुर्बल संस्थागत नींव और उत्तरदायित्व की कमी, नीति‑विन्यास को निरंतर चक्रव्यूह में फँसा रही है।
यदि जल्द ही स्पष्ट गठबंधन नहीं बन पाता, तो तमिलनाडु की प्रशासनिक योजना, विकास‑परियोजनाओं की गति तथा जनसेवा की निरंतरता सबकुशलता के अधीन रह जाएगी। इस स्थिती में, सार्वजनिक जवाबदेही को मजबूती प्रदान करने के लिये न केवल राजनैतिक वर्ग, बल्कि सभी हितधारकों को मिलकर संस्थागत सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी।
Published: May 9, 2026