जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

तमिलनाडु में सत्ता गठित करने के विचार‑विचार में ‘जनमत की अनादर’ – कमल हसन की चेतावनी

तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद, तमिलागा वेट्री क़ज़हग (TV‑K) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरा है। फिर भी राज्यपाल को इस सबसे बड़ी दल को सरकार बनाकर नियुक्त करने के लिए प्रारम्भिक आमंत्रण नहीं भेजा गया। इस पर अभिनेता‑राजनीतिज्ञ कमल हसन ने गंभीर स्वर में मौजूदा प्रक्रिया को ‘जनसमुदाय की अनादर’ करार दिया और राजभवन की गंभीर चूक की ओर इशारा किया।

हसन का तर्क स्पष्ट है: बहुमत का प्रमाण केवल चुनावी संख्याओं से नहीं, बल्कि विधानसभा की बैठक में सदस्यों के समर्थन से ही प्राप्त होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजभवन में बैठकर सरकार बनाना संविधानिक प्रावधानों के विपरीत है, जहाँ शासक को संसद (या विधानसभा) की ताकत पर भरोसा करना चाहिए।

इस मांग के पीछे दो प्रमुख प्रशासनिक प्रश्न उभरते हैं। पहला, चुनावी परिणाम के बाद राज्यपाल द्वारा ‘सबसे बड़ी पार्टी’ को प्रथम अवसर देना नैतिक और संवैधानिक मानदंडों के अनुसार क्यों नहीं किया गया? दूसरा, वर्तमान प्रणाली में बहुविकल्पीय बहुमत को सिद्ध करने की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट है—क्या यह अभिरुचिकर राजनीतिक गणना या वैधानिक स्पष्टता पर आधारित है?

कई नीति-विशेषज्ञों ने इस स्थिति को ‘संस्थागत सुस्ती’ का उदाहरण बताया है। जब राजभवन के सलाहकारों का मानना है कि एकतरफा निर्णय सार्वजनिक भरोसे को कमजोर करेगा, तो वे अक्सर ‘रख-रखाव’ के नाम पर कदम उठाने में हिचकिचाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, नागरिकों को अस्थायी अस्थिरता का सामना करना पड़ता है; अनिश्चित सरकार के कारण सार्वजनिक सेवाओं में देरी, विकास परियोजनाओं का टालमटोल और प्रशासनिक आदेशों में भ्रम उत्पन्न होता है।

हसन ने यह भी संकेत दिया कि यदि बहुमत का प्रमाण विधानसभा के मंच पर नहीं दिखता, तो उसे राजभवन में ठहराया गया कोई भी निर्णय कानूनी चुनौती के जोखिम में रहेगा। यह टिप्पणी लोकतांत्रिक प्रबंधन की बुनियादी आवश्यकता को रेखांकित करती है—वॉट्स अप, नहिं तो पॉलिसी‑मेकर्स को अपनी प्रक्रिया को पुनः परीक्षण करना पड़ेगा।

सरकारी प्रतिक्रिया के संदर्भ में, राज्यपाल कार्यालय ने अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया है। इस मौन को अक्सर ‘संतुलन‑रक्षा’ के रूप में व्याख्या की जाती है, परन्तु वास्तविकता में यह जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। यदि प्रशासनिक तंत्र अपने निर्णय को सार्वजनिक रूप से वैध ठहराने में विफल रहता है, तो वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को क्षीण कर देता है।

जनता के दृष्टिकोण से इस असंगति का प्रभाव तत्कालिक है। चुनावी वादों की पूर्ति के लिये निरंतर औसत प्रशासनिक गति के साथ कार्य करने वाले आम नागरिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्रों में सुधार की आशा रखते हैं। सत्ता के आयोजन में अनिश्चितता उनके भरोसे को कमजोर करती है और सार्वजनिक भावनाओं को निराशा की ओर धकेलती है।

संक्षेप में, कमल हसन का बयान केवल एक व्यक्तिगत अपील नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत चेतावनी है। यह सरकार, राज्यपाल और न्यायिक संरचनाओं को यह पुनः विचार करने का अनुरोध करता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ‘बहुमत का सिद्धान्त’ को किस स्थान पर रखना चाहिए। यदि यह याद नहीं रखा गया, तो तमिलनाडु की प्रशासनिक छवि और नागरिक सहभागिता दोनों को ही क्षति पहुँचेगी।

Published: May 7, 2026